नारी।
टूटकर भी जो बिखरती नहीं, वही अडिग नारी,
दर्द सहकर भी जो आगे बढ़े, वही सजग नारी।
सदियों की चुप्पी में पली, सब्र की मिट्टी में ढली,
बिन शोर किए बदल दे, ऐसी गहरी नारी।
देह नहीं, वह दृष्टि है, सोच का उजला विस्तार,
नर्म शब्दों में भी रखती, ठोस अर्थ नारी।
घर की देहरी लाँघ आई, समय से आँख मिला,
क़लम थामे भविष्य रचे, सच की साथी नारी।
न दया माँगे ज़माने से, न रहम की आस रखे,
अपने ही उसूलों पर चलने की आदी नारी।
जो उसे कमज़ोर समझे, वह भ्रम में जीता है,
रेशम-सी लगती बाहर, भीतर से दृढ़ नारी।
"प्रसंग" कहे, यह शोर नहीं, चेतना की रेखा है,
जहाँ नज़ाकत ही शक्ति बने, वही सच्ची नारी।
"प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर