यह रंग नहीं, तमाशा है
बलात्कार के मौसम में त्योहार का यह शोर,
औरत जले बीच चौराहे, सबको तमाशा है।
जिस आग से काँप उठे आसमान तक रोए,
उसी आग पर हँसना समाज का तमाशा है।
कपड़े उछाल दिए, चरित्र नाप डाला,
दरिंदे बरी घूमे, इंसाफ़ तमाशा है।
कानून किताबों में, सड़कों पर खामोशी,
चीख़ें दम तोड़ें और व्यवस्था तमाशा है।
माँ-बहन के नारे होंठों पर चिपके हैं,
रात उतरते ही वही हवस का तमाशा है।
चिता पर गुलाल फेंक, उत्सव मना लिया,
शर्म को जलते देखना संस्कृति तमाशा है।
जो बोले, उसे कुचल दो, जो जले, वही दोषी,
यह भीड़ का न्याय नहीं, बस सस्ता तमाशा है।
इतिहास पूछेगा इस रंगीन शहर से,
क्यों जलती नारी पर भी आँखों में तमाशा है।
'प्रसंग' कहे, यह होली नहीं, अपराध है,
जहाँ औरत की राख पर हँसना तमाशा है।
"प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर