लघुकथा : “सार्वजनिक”
गाँव के मोड़ से रोज दो औरतें गुजरती थीं..।
मैंने कई दिन देखा, वे सार्वजनिक शौचालय की तरफ जाती थीं। एक दिन पूछ ही लिया
“आप लोग रोज उधर… शौच के लिए जाती हैं क्या?और अगर जाती हैं तो सिर्फ आप दोनों क्यों और लोग क्यों नहीं "
वे दोनों हल्का-सा हँसीं...
“नहीं दीदी, हम लोग तो साफ-सफाई करने जाते हैं… शौचालय की ।”
मैं थोड़ी झेंपी, फिर सहज जिज्ञासा में पूछा...
“अच्छा, तो शौच के लिए?”
एक ने बिना मेरी ओर देखे कहा..
“खेतों में।”
मैं चौंकी..
“अरे, यहाँ तो इतना बड़ा शौचालय बना है… कोई नहीं जाता?”
दूसरी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा.
“जाता है न… जिसने बनवाया है।”
“किसने?”
“प्रधान जी… और उनके घर के लोग।”
इतना कहकर वे अंदर चली गईं। दरवाज़े पर बड़े अक्षरों में लिखा था..
“सार्वजनिक शौचालय - स्वच्छ गाँव, स्वस्थ गाँव।”
~रिंकी सिंह
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