अंतिम लिबास
लिबासों का शौक़ रखते थे जो कभी,
आखिरी वक्त कह ना पाए ए कफ़न ठीक नहीं।
जीवन की राहें कितनी उलझी हुईं हैं,
हर साँस में छुपा कोई गहरा फ़साना ठीक नहीं।
मौत की छाया जब तक हमारे कदमों में रहे,
खुशियाँ भी लगती हैं आधा अधूरा ठीक नहीं।
धड़कनों की गूँज सुनती हैं अब हवाएँ,
बिन आवाज़ के बीतना भी ग़ज़ब का ठीक नहीं।
यादों की चादर ओढ़े रहते हैं लोग,
मौत के आने पर सब कोई अकेला ठीक नहीं।
ए "प्रसंग", समझ ले अब हर पल की अहमियत,
इस सफ़र में याद रख, मौत का पैग़ाम भी ठीक नहीं।
"प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर