कई बार बेड़ियाँ लोहे की नहीं होतीं,
वो सोच की होती हैं।
और दुख की बात ये है कि
कभी-कभी वही सोच एक औरत दूसरी औरत को दे देती है।
“हमने सहा था, तुम भी सहो…”
ये वाक्य दरअसल दर्द की विरासत है।
जिसने खुद अन्याय सहा,
वो उसे गलत मानने के बजाय
उसे “परंपरा” मान बैठी।
क्यों?
क्योंकि अगर वो मान ले कि उसके साथ गलत हुआ था,
तो उसे अपनी पूरी जिंदगी का सच देखना पड़ेगा।
और वो बहुत तकलीफ़ देता है।
इसलिए कई औरतें
अपने जख्मों को संस्कार का नाम दे देती हैं।
और फिर अगली पीढ़ी को भी वही सिखाती हैं —
“चुप रहो तो अच्छी हो।”
“सहन करो तो इज्ज़त मिलेगी।”
लेकिन सच्चाई ये है —
सहन करना अच्छाई का पैमाना नहीं है।
अत्याचार को रोकना ही असली हिम्मत है।
अच्छी बहू या पत्नी वो नहीं
जो मार खाकर भी मुस्कुराए,
बल्कि वो है
जो सम्मान से जीना सीखे
और दूसरों को भी सिखाए।
समस्या औरत नहीं है,
समस्या वो सोच है
जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही।
और बदलाव भी
एक औरत से ही शुरू होगा —
जो कहेगी,
“मेरे साथ जो गलत हुआ,
वो मैं अपनी बेटी या बहू के साथ नहीं होने दूँगी।”
- archana