एक अनकही दास्तां तेरी और मेरी रह गई,
लबों तक आकर हर बात अधूरी रह गई।
नज़रों ने कह दिया जो ज़ुबां कह न सकी,
भीड़ में भी हमारी मुलाक़ात अधूरी रह गई।
वक़्त ने चाहा कि फ़ासले कुछ कम हों,
पर हर कोशिश के बाद दूरी रह गई।
तेरी ख़ामोशी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया,
मेरी हर शिकायत भी बेआवाज़ रह गई।
हम साथ थे, फिर भी साथ न हो पाए कभी,
क़िस्मत की लिखावट कुछ ऐसी रह गई।
नाम तेरा दिल ने हर दुआ में लिया,
मगर हर दुआ मुक़म्मल न हो सकी, अधूरी रह गई।
आज भी यादों में तेरी खुशबू बसती है,
इक अनकही दास्तां… जो तेरी और मेरी रह गई।