कभी पूछो अपनी माँ, बहन, पत्नी, बेटी से,
क्या आज चलें दो पल साथ घूमने?
क्या आज करें दो पल अपने मन की बातें?
क्या आज दो पल के लिए
एक-दूसरे के आँसू पोंछ लें?
क्या दो पल उन्हें बस इंसान रहने दें?
कभी पूछो उनसे,
क्या उनके भी कुछ सपने अधूरे हैं?
क्या वो भी कभी थक जाती हैं?
क्या वो भी कभी बिना वजह हँसना चाहती हैं?
जिन्होंने तुम्हारी हर खुशी में
अपनी खुशियाँ जोड़ दीं,
क्या तुमने कभी सोचा
उनकी खुशी किसमें है?
दो पल अगर तुम साथ बैठ जाओ,
तो शायद वो सब कह पाएँ
जो सालों से दिल में छुपाए बैठी हैं।
क्योंकि वो मजबूत जरूर हैं,
पर पत्थर नहीं,
वो मुस्कुराती जरूर हैं,
पर बेपरवाह नहीं —
वो सबसे पहले
एक इंसान हैं।