"भीड़ बनाम…"
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गुजरती हैं भेड़
कि तरह हड्डियां भी।
अस्थिया नहीं चाहती
उनके बीच किसी
नाम अनंत,अनाम सत्ता को।
जिसकी भीड़ खाई में कूदी
उनकी आबादी ज्यादा थी या
कम से कम
गठरियों को कोई फर्क नहीं पडा
किस भेड़िए की जुबान क्या
मांग करती है वे जानते हैं
जानते हैं कि खाई से भी बड़ा है
लकड़बग्घों का पेट।
चीखती भेड़ें,
दौड़ती भेड़ें,
निर्मम भेड़े,
प्यासी भेड़े,
कितना छोटा समूह
अलाव में जलता है
कितनों की खाल
बिक्री नहीं हो पाती
वासना अनंत है
हड्डियां मर्यादित।
क्या हो सकता है
से ज्यादा क्या होना चाहिए
इसपर कोई माइक नहीं बोलता
स्टेज के ढांचे पर मुर्दा वही प्रश्न पूछता है
जो उसने कभी न देखे हो।
कुपोषित भेड़ों के बारे में
न तो किसीको खबर है
न ही दरिद्रता से भरी भेड़ों को
कोई जानता है।
सबका अपना अलग विकास है
सपने सा विकास।
झूठ बोलने वाला डिस्क्रिप्शन में
लिखा ही नहीं जाता
भेड़ों को सब पता है
वे जानती हैं
किसकी जेब में कितनी हरी घास हैं।
सुझाव कोई नहीं देता
ये भ्रम है
खाई से उपजा भ्रम
जिसे कोई भूख मिटा नहीं सकी।
दुनिया चलती है
क्या फर्क पड़ता है
उनको पलाना है
इसी जगह में
जिसकी हड्डियां तूती
उसको भी दवा नसीब नहीं होती
सब भेड़े जागते हुए
बेहोशी कि नींद में
भेड़ियों का इंतजार करती है।
और इसी तरह
गुजर जाते है पांच साल
जैसे गुजरती है भेड़े।
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