स्त्री की चाह कभी आज़ादी थी ही नहीं। उसकी चाह तो बस उन मर्यादाओं को तोड़ना थी, जो सिर्फ़ उसके लिए बनाई गई थीं। पुरुषने जो मर्यादा तोड़ी, अपना सुकून पाने के लिए,वही मर्यादा तोड़ना चाहती थी स्त्री।
आज़ादी का भ्रम दिखाकर आख़िरकार स्त्रीने मर्यादा की खींची लकीर को तोड़ ही दिया।