*कलयुग की बयार*
झोरी भर-भर बाँट रहे सब, लोभ-लालच की ये बेरा, जीवित होकर मरे पड़े हैं, देख कलयुगी अँधेरा। नाम लिखत हैं अब तो दिल पे, बस सिक्कों की खनक देख, पंच-पटेल भी डोल रहे हैं, गाम-गली की चमक देख।
पईसा की है सिगरी माया, पईसा ही अब धरम है, हाथ काट कर हाथ जोड़ते, कैसा ये भरम है? रो-रो कर कछु काटें जीवन, औरन की खुशहाली में, अपनी थाली सूखी छोड़ें, झाँकें दूजे की थाली में।
माया को डंका ना बाजे, जब यम लेवे डंडा हाथ, कोरी रह जावे चतुराई, कोई ना जावे संग साथ। रोकड़ा और जूता ही बस, आवें यहाँ अब काम रे, बिना भजन और बिना करम के, होवे तू नाकाम रे।
जगत घूमे तू व्यर्थ ही प्यारे, तज दे सब अभिमान, बिना सार के जीवन तेरा, फटे ढोल के समान। कहे 'आशिष' सुन बावरे, कर ले नेक कुछ काम, अंत समय ना काम आएगी, ये माया और ये दाम।
Adv. आशीष जैन
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