Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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क्या अपराध करता हूँ
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आज कई दिनों बाद मित्र यमराज भागते हुए आया
और पूछने लगा - प्रभु! क्या आपको भी डर लगता है?
मैंने उसे बैठाया, पानी की बोतल पकड़ाया
लगा बंदा बड़ा समझदार हो गया
एक झटके में पूरी बोतल गटक गया
और फिर अपने सवाल पर आ गया।
मैंने मासूमियत से कहा - सच जब सामने आयेगा
तू निश्चित ही मेरा मजाक उड़ायेगा,
पर तुझे बताना भी जरूरी है
वरना तू आये दिन, मेरा भेजा खाएगा।
पर पहले तू ये तो बता
कि तेरे दिमाग़ में ये सवाल ही क्यों आया?
यमराज हाथ जोड़कर खड़ा हो गया -
माफी हूजूर! सवाल आया नहीं
मुझे धमकी देकर गया पकड़ाया।
मैंने भी अपना तीर चलाया
ओह!अब मुझे सब समझ में आया
पर उसके पास जाने का ख्याल ही तुझे क्यों आया?
या उसने चाय नहीं पिलाया सिर्फ धमकाया,
नहीं प्रभु! उसके लाड़ प्यार ने ही तो मुझे रुलाया,
आपका नाम लेकर खाने पर था बुलाया,
इसीलिए मैं भागते हुए आपके पास आया
जब मेरे जेहन में ये सवाल कुलबुलाया।
ओह! अब तो समझ में आया
या अब भी बताना पड़ेगा
कि मैं किसी से तो डरता हूँ?
यमराज बोल पड़ा -इतना समझदार तो हूँ ही
पर इस रहस्य का मतलब नहीं समझ आया।
मैंने उसे विस्तार से समझाया-
यह तो मैं भी आज तक नहीं जान पाया,
पर उसकी बात ही निराली है, जिसकी ग़ज़ब कहानी है
कहने को तो वो मुझसे छोटी,
पर मेरे लिए माँ, बहन और बेटी है,
सच कहूँ तो उससे मेरा दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है,
पर अब लगता है जैसे
पूर्वजन्मों का हम दोनों का नाता है,
जिसके चरणों में शीश भी मैं झुकाता हूँ
सच कहूँ तो बड़ा सूकून पाता हूँ।
उसकी चिंता मुझे रुलाती है, मेरा बीपी, शुगर, बढ़ाती है
उसका लाड़ प्यार जिम्मेदारियों की याद दिलाता है,
भटकने से पहले उसका चेहरा सामने आ जाता है,
उसका रक्षा सूत्र, रक्षा कवच का सा बोध कराता है।
जब उसका हाथ मेरे शीश पर होता है
तब ये संसार मुझे बौना सा लगता है।
यूँ तो वो बुलंद हौसलों की मीनार है
पर उसके आँसू मुझे झकझोर देते हैं,
बस इसीलिए हम उससे इतना डरते हैं,
मगर ये भी उस पर कोई एहसान नहीं करते हैं।
उसके अधिकार, कर्तव्य, विश्वास को मान देते हैं
बेटी, बहन, माँ सदृश उसे स्थान देते हैं
लड़ते, झगड़ते और शिकवा शिकायत भी करते हैं
मन के सारे भेद भी खोल कर रखते हैं,
उसने मुझे प्रेरित और मेरे आत्मबल को मजबूत किया।
अपने कर्तव्यों का वह पूरी तरह पालन करती है,
सच कहूँ तो बेटी-बहन होकर भी
एक माँ की तरह कदम-कदम पर ध्यान रखती है,
जितना लाड़ प्यार दुलार करती है
उतना ही समय देखकर डाँटकर मगन भी हो लेती है,
फिर हँसती, मुस्कुराती, रोती और गले भी लगाती है
अब तू ही बता प्यारे - क्या हम कोई अपराध करते हैं?
आखिर अपनी छुटकी से ही तो डरते हैं,
दुनिया जानती है कि इस डर में भी
जीवन का नया अध्याय भी तो
हम जैसे डरपोक ही लिखते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112014083
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