॥ दक्षिण का वह दिव्य प्रकाश: चामुंडराय ॥
हाथ में तलवार जिसके, मन में जिनवर का ध्यान था,
शक्ति और भक्ति का वह, संगम बड़ा महान था।
दक्षिण की उस माटी का, जो बना अनोखा मान था,
चामुंडराय वह योद्धा, जैन धर्म की शान था।
साम्राज्य की रक्षा में जिसकी, बिजली सी तलवार चली,
पर सत्य-अहिंसा की राहों पर, जिसकी पावन धार चली।
वैराग्य जगा जब अंतर में, मोह के बंधन तोड़ दिए,
राज-काज के वैभव सारे, प्रभु चरणों में छोड़ दिए।
विंध्यगिरी की शिला काट कर, अद्भुत मूरत गढ़ डाली,
बाहुबली के चरणों में, अपनी किस्मत लिख डाली।
अभिमान गला जब भक्त का, तब चमत्कार दिखलाया था,
छोटी सी उस बुढ़िया ने, प्रभु को दूध से नहलाया था।
त्याग बना जब आभूषण, तब पत्थर भी मुस्काया था,
गोमटेश की छाया में, उसने जग को राह दिखाया था।
आशीष कहे यह गाथा, जो भक्ति का उजियारा है,
दक्षिण का वह 'दिव्य प्रकाश', आज भी जग का तारा है।
Adv. आशीष जैन(श्रीचंद)
7055301422