*उड़ान*
मैं रास्तों के बीच खड़ा,
हाथों में फैली हर दिशा।
एक कदम आगे बढ़ना चाहे,
एक पीछे खींचे अपनी दशा।।
एक ही देह में कई साये,
सबके अपने-अपने नाम।
कोई उड़ना चाहता है खुलकर,
कोई ढूंढे ठहराव का काम।।
हवा ठंडी, सोचें भारी,
समय भी जैसे थम गया।
पांव जमीन पर जमे रहे,
मन आसमान में रम गया।।
पीछे छूटती मेरी परछाइयां,
कहती है तू अकेला नहीं।
तेरे भीतर कई आवाजें हैं,
पर सच सुनना सरल नहीं।।
यह गिरना नहीं यह रुकना है,
खुद से मिलने का एक पल।
जब सारे रास्ते चुप हो जाएं,
तभी निकलता है सही कल।।
याद आता है वह बचपन मेरा,
जब डर से कोई नाता नहीं।
हाथ फैला कर दौड़ लिया करता,
तब गिरने की भी चिंता नहीं।।
कंधों पर थे सपनों के पंख,
आसमान छोटा लग जाता था।
हर रास्ता अपना सा लगता,
हर कल मुझको बुलाता था।।
आज वही मैं ठहरा खड़ा,
हिसाबो से बंधी हर चाह।
वो आजादी अब याद बन गई,
जो थी कभी मेरी ही राह।।
तब एक दिशा काफी थी,
आज हर मोड पर सवाल है।
बचपन की उसे निडर हंसी में,
मेरे सबसे सच्चे ख्वाब हैं।।
-नमो नारायण दीक्षित कानपुर उत्तर प्रदेश