पतंगों से रोशन आसमान तक
14 जनवरी की ठंडी सुबह,
जयपुर ने ओढ़ी धूप की चादर।
छतों पर हँसी, हाथों में डोर,
और नीला आसमान बना सबका साथी।
रंग-बिरंगी पतंगें उड़ीं,
कभी पास, कभी बहुत दूर।
किसी की कटी, किसी की जीती,
हर दिल में था अपना-अपना सुर।
“वो काटा, ये काटा!” की गूंज के बीच,
तिल के लड्डू, चाय की खुशबू।
माँ की मुस्कान, भाई-बहनों, दोस्तों की शरारत,
हर पल था यहाँ कुछ कहने को।
फिर ढलने लगी जब शाम धीरे धीरे,
आसमान ने बदला अपना रंग।
पतंगें सो गईं थक कर शायद,
पर उम्मीदें रुकती नहीं, किसी भी पल।
रात आई मोमबत्ती संग,
हाथों में नन्ही-सी लौ।
लालटेन बैलून बने सपने,
जो उड़ चले, बस ऊपर को।
एक-एक कर रोशन हुए,
जयपुर के आसमान सारे।
जैसे अंधेरे से कह रहे हों,
“डर मत, उजाला है पहचान तेरी !!”
उस रात समझ आया ये सच,
पतंग सिखाती है संभलना।
और लालटेन बैलून सिखाते हैं,
छोड़ देना… और आगे बढ़ जाना |
मकर संक्रांति बस त्योहार नहीं,
ये है मन का नया सवेरा।
जहाँ हर दिल थोड़ा हल्का हो जाए,
और ज़िंदगी लगे और भी प्यारी !!
लेखक
अँकुर सक्सेना “मैडी”
[ANKUR SAXENA “MADDY”]
सेक्टर 71, सांगानेर, प्रताप नगर
जयपुर, राजस्थान
भारत
सोमवार, 12 जनवरी, 2026 को लिखी गयी कविता