जो हर बात पर मुस्कुराती है,,
तुम्हारे लिए बातें ढूंढ कर लाती है।
आज खामोश बैठी है,,न जाने कैसे ये हालात है
बताएगी नहीं,, लेकिन कुछ तो बात है।
वो नटखट सी हँसी,,
अब कहीं छुप सी गई है,
आँखों में भाव शून्य हैं
रूह भी थकी थकी सी है।
ऐ दोस्त, तुझमें जो उजाला था — वो आज भी है,,
बस तू थोड़ी देर खुद से दूर हो गई है।
कल तक जो हर लम्हा रोशन करती थी,
आज खुद अंधेरों से घिरी सी लगती है
वो जो सबसे पहले "क्या हुआ?"पूछती थी,
आज खुद "मैं ठीक हूँ" कहकर चुप हो जाती है।
लब्ज़ भले खामोश हों उसके
लेकिन खामोशी उसकी ,,सारे भाव कह जाती है।
तू झूठ भी कहे तो,,,तेरी हर बात सच्ची सी लगती है।
ओर तू हंसती रहा कर,,,मुस्कान तेरे चेहरे पर अच्छी लगती है।