कम्भख़त इश्क़ :-
क्या वो हसीं है हम से भी ज़्यादा, ज़रा जाते-जाते ये बताते जाना
मेरी आँखों में तुम्हारे वादों का पर्दा पड़ा है, मेहरबानी कर के उसे
भी हटाते जाना
बिन-ए-प्यार के निशानियाँ भी किस काम की साहब
अलमारी से सारे ख़त, निकाल-निकाल कर जलाते जाना
पूछेगा तुम से पहले प्यार की तआरिफ़ जब वो
तो ख़ामोश मत रहना, कुछ कह देना, या हकलाते जाना
कुछ मुख़्तलिफ़ अंदाज़ से छूना उसे, वरना मेरी झलक दिखने लगेगी
खोदने लगे अगर वो माज़ी ये देखकर, तो झूठी क़समें खाते जाना
तुम नाज़ुक बड़ी हो, सँभाल नहीं पाओगे ये इल्ज़ाम
जब भी कोई करे मेरा ज़िक्र तो, मुझे मुजरिम बता कर फँसाते जाना
हो जाए अगर हम को भूलने का क़िस्सा शुरू किसी दिन
तो बेझिझक ये राज़ की बात, हमें भी बताते जाना