हर घड़ी छाया है जिसका सुरूर है नजरों से दूर मेरे हुजूर लगता है कभी-कभी के उनको है खुद के हुस्न पे गुरूर पर इसमें कहां उनका कोई कसूर दीदार और दर्द का मिलन जब होता है हाल होता है यही दीवानों का यही है उल्फत का दस्तूर लेना जो चाहे कोई मोल ये रोग तो जान ले उड़ जाती है नींदे खो जाता है चेन ओ करार फिर रहती है अपनी न जहां की खबर जीना हो जाता है दुसवार दीदारे यार के सिवा और किसी का फिर नहीं होता इंतजार