बेचारा यमराज
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आज दोपहर मित्र यमराज आये
पहले तो पेट की भूख मिटाए,
फिर अपनी पर उतर आये।
कहने लगे - प्रभु! मुझ पर ध्यान कब दोगे?
मेरे साथ आखिर कब चलोगे?
आपके बिना अब मेरा मन नहीं लगता है
जैसे कुछ खोया-खोया सा लगता है,
अब आप निर्णय लीजिए
और मेरे साथ चलने की सहमति दीजिए।
मैं मुस्कराया - तू बड़ा बेवकूफ है भाया
जब मैं तैयार था तो तू क्यों नहीं आया?
अब इसमें मेरा क्या दोष है?
यदि तुझे मेरा प्रस्ताव ही समझ में नहीं आया।
पर अब भी तुझे परेशान होने की जरूरत नहीं है,
प्रस्ताव की फाइल अभी तक खुली है,
बड़ा उत्सुक है, तो फाइल बंद कर दे
मुझे अपने साथ लेकर अभी चल दे
मैंने तुझे रोका ही कब है?
जो तेरे मन में इतनी होने लगी हलचल।
अब तनिक भी देर मत कर- मेरा बैग उठा
क्या पता कब तेरा मन बदल जाए?
और फिर कल को, तू मुझ पर ही थोक मेंआरोप लगाए,
या वापस जाकर यमलोक में आँसू बहाए।
तू अपना यार है,
क्या ये बात तुझे फिर से तुझे बताऊँ?
या ये बता तेरी खुशी के लिए
आखिर किस हद तक गुजर जाऊँ?
अब तू मुझे साथ लेकर चलेगा? या हम तुझे लेकर चलें,
तू जैसा चाहे, वैसा ही मैं करुँ।
तेरी खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ,
इतिहास तो क्या भूगोल भी बदल सकता हूँ,
अपने यार के लिए मैं अकेले ही
अभी के अभी सीधे यमलोक तक जा सकता हूँ।
यमराज को मौन देख मैंने उसे हिलाया
वो हड़बड़ाया, क्या प्रभु! आपने मुझे क्यों जगाया?
दो मिनट चैन से सोने भी नहीं दे सकते थे
जो कहना था थोड़ा ठहरकर नहीं कह सकते थे?
आखिर यार की अच्छी भली नींद से
ये दुश्मनी क्यों निभाया?
इतना सुन मुझे इतना गुस्सा आया
कि मैंने तत्काल अपना डंडा उठाया
बेचारा यमराज भागता हुआ दूर नजर आया,
फिर भी मुझे अपने प्यारे यार पर बड़ा तरस
और खुद पर गुस्सा भी आया,
कि मित्र को आखिर मैंने नींद से जगाकर
कौन सा भारत रत्न पाया?
सुधीर श्रीवास्तव