अनकहे खत और वक्त की धूल ✉️⏳
अलमारी के उस अंधेरे कोने में,
वक्त की थोड़ी धूल जमी है उन कागजों पर,
मगर ताज्जुब है...
कि उनके भीतर दबे तुम्हारे नाम के अक्षर,
आज भी उतने ही गहरे और ताज़ा हैं। 🖋️
दुनिया के सामने अब मैं खूब बोल लेता हूँ,
🌿🌿🌿🌿🌿
महफिलों में अल्फाजों के जाल बुन लेता हूँ,
वक्त ने मुझे हर बात का सलीका तो सिखा दिया,
पर जाने क्यों...
🌿🌿🌿🌿🌿
आज भी उन पुराने खतों को भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। 🤐
वो कोरे वादे और वो बेहिसाब शिकायतें,
🌿🌿🌿🌿🌿🌿
आज भी उसी दराज में कैद होकर रह गई हैं,
शायद उन्हें डर है कि अगर वो बाहर निकले,
तो ये जो 'ठीक होने' का नकाब मैंने पहना है,
वो मिट्टी में मिल जाएगा। 🍂
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
मगर कभी-कभी सोचता हूँ,
कि अगर आज मैं ये खत जला दूँ,
🌿🌿🌿🌿🌿🌿
तो क्या मेरे भीतर का वो हिस्सा भी राख हो जाएगा,
जो आज भी सिर्फ तुम्हारे लिए धड़कता है? 🥀
(आखरी पंक्तियाँ)
🌿🌿🌿🌿🌿
शायद कुछ यादें भेजने के लिए नहीं,
बस सहेजने के लिए होती हैं...
ताकि हम खुद को याद दिला सकें,
कि हम कभी 'पूरे' भी हुआ करते थे। ✨