"इंतिहा की तन्हाई"
जब ज़िंदगी ग़मज़दा बन जाती है,
हर ख़ुशी भी फिर सज़ा बन जाती है।
तन्हाई से इश्क़ हो जाता है इस क़द्र,
सिसकियाँ भी फिर मज़ा बन जाती हैं।
लोग समझने लगे जिसे सब्र की तासीर,
वो रूह भीतर से रुस्वा बन जाती है।
उम्र यूँ ही गुज़र गई इम्तिहानों में “कीर्ति”,
हर सुबह एक नई इंतिहा बन जाती है।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️