*ॐ नमः शिवाय*
*वेदों को कण्ठस्थ करना, तथा वैदिक कर्मकाण्ड करना,भगवान की ही भक्ति है।*
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*पद्मपुराण के,पातालखण्ड के,85 वें अध्याय के,5 वें और छठवें श्लोक में,देवर्षि नारदजी ने,महाराज अम्बरीष जी को,वैशाखमास का माहात्म्य श्रवण कराने के पश्चात,महाराज अम्बरीष को,भक्ति के भेद बताते हुए कहा कि-*
*लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा।* *ध्यानधारणया बुद्ध्या*
*वेदानां स्मरणं हि यत्।।5।।*
सूत जी ने कहा कि- हे ऋषियो! भक्ताग्रगण्य महाराज अम्बरीष ने,नारद जी के मुखारविन्द से, वैशाख मास का माहात्म्य श्रवण करने के पश्चात,नारद जी से, भक्तिविषयक प्रश्न करते हुए कहा कि-
हे देवर्षि नारदजी! आप के तो हृदय में,ज्ञान और भक्ति के सहित भगवान नारायण ही निवास करते हैं।
ज्ञान और भक्ति के अगाध तत्त्व को जाननेवाले एकमात्र आप ही हैं। आप तो, ज्ञानियों से तथा भक्तों से सर्वदा ही सत्संग करते रहते हैं,तथा भगवान के नाम का संकीर्तन भी निरन्तर करते रहते हैं।
आप तो,ज्ञान और भक्ति,दोनों के विग्रहस्वरूप ही हैं।
मैं,आपके मुखारविन्द से,भक्ति के स्वरूप का श्रवण करना चाहता हूं।
नारद जी ने कहा कि-
*लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा।।*
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भक्ति,तीन प्रकार की होतीं हैं।
*(1) लौकिकी* *(2)वैदिकी तथा* *(3) आध्यात्मिकी।*
*मनोवाक्कायसम्भवा।*
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ये तीनों प्रकार की भक्ति,मन से,वाक् अर्थात वाणी से तथा काया अर्थात शरीर से होतीं हैं।
भगवान को उद्देश्य करके,व्रत,उपवास, करना,ये मानसिक संकल्प की दृढ़ता पूर्वक भक्ति है।
भगवान के नाम का जप करना,ये भी मानसिक भक्ति है। जिह्वा से भगवान के नाम का संकीर्तन करना,ये वाक् अर्थात वाणी की भक्ति है। भगवान के मंदिर को शुद्ध स्वच्छ रखते हुए,उनके लिए विविध प्रकार के पुष्प,पुष्पमाला,आभूषण,वस्त्र,तथा स्वादिष्ट भोजन आदि निवेदन करना,ये शारीरिक भक्ति है। क्यों कि-बिना शारीरिक परिश्रम के,धन नहीं आता है। शारीरिक परिश्रम करके,धन एकत्रित करके,भगवान के लिए प्रियातिप्रिय वस्तुओं को निवेदित करना,ये शारीरिक भक्ति है।
कायिक,वाचिक तथा मानसिक भक्ति में, एकमात्र भगवान ही उद्देश्य रहते हैं।
लौकिकी वैदिकी इन दोनों प्रकार की भक्ति में, सांसारिक सुखों को प्राप्त करने के उद्देश्य से,की गई भगवान की भक्ति,लौकिकी भक्ति कही जाती है।
*ध्यानधारणबुद्धया वेदानां स्मरणं हि यत्।।*
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लौकिकी भक्ति में,ध्यान से,आध्यात्मिकी भक्ति में,धारणा से,तथा वैदिकी भक्ति में,बुद्धि से भक्ति समझना चाहिए।
*वेदानां स्मरणं हि यत्।*
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वेदों का स्मरण करना,वैदिकी भक्ति है। वेदों को,बुद्धि में स्थिर करना,भी भगवान की भक्ति है। भगवत्स्वरूप वेद हैं,तथा वेदों के मन्त्रों से ही भगवान के स्वरूप का यथार्थज्ञान होता है।
वेदों के अध्ययन से,ज्ञान से ही भगवान के विषय का ज्ञान होता है।
इसी को "बुद्धया"शब्द से वैदिकी भक्ति कहा जाता है।
नेत्र,नासिका,कर्ण,त्वचा और जिह्वा,इन पांचों इन्द्रियों को नियंत्रित करके,एकाग्रचित्त होकर, वेदों का निरन्तर अभ्यास करते हुए,उनके प्रयोग की विधि का ज्ञान करके,देवतात्मक भगवान के लिए,यज्ञ आदि करना "वैदिकी" भक्ति है।
*मंत्रवेदसमुच्चारैरविश्रान्तविचिन्तनै:।।6।।*
वेद के मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करते हुए,उन मंत्रों का, *अविश्रान्त,अर्थात विना विश्राम के,* निरन्तर चिन्तन करना ही वैदिकी भक्ति है।
*जब कोई ब्राह्मण,मंत्रों का उच्चारण करते हुए,कण्ठस्थ करते हैं तो,उनकी बुद्धि में, सांसारिक अन्य किसी विषय का चिन्तन नहीं होता है।*
जिस काल में,वेदों के अध्ययन का विधान है,उसी काल में,वेदों का उच्चारण करने के लिए, ब्रह्ममुहुर्त में,उठकर,शौच,स्नान, शुद्ध वस्त्र धारण करके, ध्यानपूर्वक बुद्धि में स्मरण शक्ति के बलपर, निरन्तर ही वेद मंत्रों का उच्चारण करना,यह भी भगवान की भक्ति है।
*बुद्धि को नियमों में नियंत्रित करना,मन को नियमों में नियंत्रित करना,तथा शुद्ध, सात्विक भोजन आदि करना,ये सभी, वैदिकी भक्ति है।*
इन्द्र नवग्रह आदि देवताओं को,वैदिक विधि के अनुसार,विविध प्रकार के संयम करते हुए, देवताओं के सहित भगवान को प्रसन्न करना,वैदिकी भक्ति है।
*इसका तात्पर्य यह है कि- सांसारिक सुखों को त्यागकर,नियम संयम पूर्वक,एकमात्र भगवान का ध्यान करना,धारणा और ध्यान है।*
*ध्यान और धारणा,दोनों ही आध्यात्मिकी भक्ति है।*
*संयम नियम पूर्वक,गुरु की सेवा करते हुए,वेदों को शुद्ध उच्चारण के साथ साथ,उसके प्रयोगविधि को जानकर,उन मंत्रों का,सामग्री सहित उपयोग करना,भक्ति है।*
*अपनी अपनी शक्ति के अनुसार,भक्तगण, भगवान की भक्ति करके,भगवान के प्रिय हो जाते हैं।*
*इसका अभिप्राय यह है कि- तनसुखों का परित्याग करके,भगवान को उद्देश्य करके,आत्मप्राप्ति को उद्देश्य करके,किए जानेवाले आध्यात्मिक वैदिकी विधि को आत्मसात करना ही भगवान की भक्ति है।