Quotes by Aachaarya Deepak Sikka in Bitesapp read free

Aachaarya Deepak Sikka

Aachaarya Deepak Sikka Matrubharti Verified

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ॐ नमः शिवाय।



आसक्ति मानसिक क्रिया है। इसका अभिप्राय यह है कि मन बार-बार अपनी आसक्ति के विषयों की ओर भागता है जो किसी व्यक्ति, इन्द्रिय विषय, प्रतिष्ठा, शारीरिक सुख त्यादि में हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति या इन्द्रिय विषय का विचार हमारे मन में बार-बार उठता है तब निश्चय ही यह मन का उसमें आसक्त होने का संकेत है। यदि यह मन ही आसक्त हो जाता है तब भगवान इस आसक्ति के विषय के बीच बुद्धि को क्यों लाना चाहते हैं। क्या आसक्ति का उन्मूलन करने में बुद्धि की कोई भूमिका होती है? हमारे शरीर में सूक्ष्म अंत:करण होता है जिसे हम बोलचाल की भाषा में हृदय भी कहते हैं। यह मन, बुद्धि और अहंकार से निर्मित होता है। इस सूक्ष्म शरीर में बुद्धि मन से श्रेष्ठ है जो निर्णय लेती है जबकि मन में इच्छाएँ उत्पन्न होती है और यह बुद्धि द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार मोह के विषयों में अनुरक्त हो जाता है।



उदाहरणार्थ यदि मनुष्य की बुद्धि यह निर्णय करती है कि धन सम्पत्ति ही सुख का साधन है तब मन में धन प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हो जाती है। यदि बुद्धि यह निश्चय करती है कि जीवन में प्रतिष्ठा ही सबसे महत्त्वपूर्ण है तब मन में प्रतिष्ठा और ख्याति पाने की अभिलाषा उत्पन्न होती है। दूसरे शब्दों में, मन में बुद्धि के बोध के अनुसार इच्छाएँ विकसित होती हैं।



पूरे दिन हम अपने मन को बुद्धि द्वारा नियंत्रित करते हैं। जब हम अपने घर में होते है तब हम अनौपचारिक मुद्रा में रहते हैं जिसमें मन भी सहजता का अनुभव करता है जबकि अपने कार्यालय में रहते हुए हम औपचारिक मुद्रा में रहना सही समझते हैं। ऐसा नहीं है कि मन कार्यालय की औपचारिकताओं में प्रसन्न रहता है, अपितु वह अवसर मिलते ही अपेक्षाकृत घर जैसी अनौपचारिकताओं को अंगीकार करना चाहता है। इस प्रकार हमारी बुद्धि निश्चय करती है कि कार्यालय में औपचारिक आचरण का पालन करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि मन को नियंत्रित करती है और हम पूरे दिन अपने कार्यालय में औपचारिक मुद्रा में रहते हैं और हमें मन की प्रकृति के विपरीत औपचारिक शिष्टाचार का पालन करना पड़ता है। इसी प्रकार मन कार्यालय के कार्यों में सुख अनुभव नहीं करता। यदि उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तब वह कार्यालय में कार्य करने की अपेक्षा घर में बैठकर टेलीविजन देखना चाहेगा किन्तु बुद्धि उसे यह आदेश देती है कि जीवन निर्वाह हेतु कार्यालय में बैठकर कार्य करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि पुनः मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाती है और लोग आठ घंटे या अधिक समय तक कार्य करते हैं।



उपर्युक्त उदाहरण से हमें यह ज्ञात होता है कि हमारी बुद्धि मन को नियंत्रित करने में सक्षम है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि को उचित ज्ञान के साथ पोषित करना चाहिए और उसका प्रयोग मन को उचित दिशा की ओर ले जाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने में करना चाहिए।



बुद्धियोग मन को कर्म फलों से विरक्त रखने का विज्ञान है जो बुद्धि में यह दृढ़ निश्चय विकसित करता है कि सभी कार्य भगवान के सुख के निमित्त हैं। ऐसी स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य एकाग्रता से अपने लक्ष्य पर ध्यान रखता है और निर्बाध गति से धनुष से छोड़े गए बाण के समान अपने मार्ग को पार कर लेता है। ऐसा साधक यह संकल्प लेता है-"यदि मेरे मार्ग में लाख बाधाएँ उत्पन्न हो जाएँ और यदि सारा संसार मेरी निंदा करे और यदि मुझे अपने जीवन का भी बलिदान क्यों न करना पड़े तब भी मैं अपनी साधना नहीं छोडूंगा।



" साधना की उच्च अवस्था में यह संकल्प इतना अधिक दृढ़ हो जाता है कि साधक को अपने मार्ग पर चलने से कोई डिगा नहीं सकता किन्तु वे लोग जिनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त है, अपने मन को विभिन्न दिशाओं की ओर भटकते हुए पाते हैं। वे मन की एकाग्रता को विकसित करने में समर्थ नहीं होते जो भगवान की ओर जाने वाले मार्ग के लिए आवश्यक होती है।



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आचार्य दीपक सिक्का

संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी

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ॐ नमः शिवाय।



कौन सा ग्रह क्या अशुभ फल देता है:-



सूर्य

सरकारी नौकरी या सरकारी कार्यों में परेशानी, सिर दर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, अस्थि रोग, चर्म रोग, पिता से अनबन आदि।



चंद्र

मानसिक परेशानियां, अनिद्रा, दमा, कफ, सर्दी, जुकाम, मूत्र रोग, स्त्रियों को मासिक धर्म, निमोनिया।



मंगल

अधिक क्रोध आना, दुर्घटना, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, बवासीर, भाइयों से अनबन आदि।



बुध

ज्योतिष आचार्य आनन्द जालान के अनुसार गले, नाक और कान के रोग, स्मृति रोग, व्यवसाय में हानि, मामा से अनबन आदि।



गुरु

धन व्यय, आय में कमी, विवाह में देरी, संतान में देरी, उदर विकार, गठिया, कब्ज, गुरु व देवता में अविश्वास आदि।



शुक्र

जीवन साथी के सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, भौतिक सुखों में कमी व अरुचि, नपुंसकता, मधुमेह, धातु व मूत्र रोग आदि।



शनि

वायु विकार, लकवा, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, पैरों में दर्द, नौकरी में परेशानी आदि।



राहु

त्वचा रोग, कुष्ठ, मस्तिष्क रोग, भूत प्रेत वाधा, दादा से परेशानी आदि।



केतु

नाना से परेशानी, भूत-प्रेत, जादू टोने से परेशानी, रक्त विकार, चेचक आदिल



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आचार्य दीपक सिक्का

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Aum Namah Shivay.



Can We Do Puja Without Maintaining Hygiene?



Well, here is what different scriptures mention about this. Read it completely and you will get all kind of answers related to this question:



Vishnu Smrti - Chapter 64, Verse 9:



न चाशौचवता कार्यं देवतार्चनकर्म वै ।

यस्तत्करोति मोहेन तस्य तन्निष्फलं भवेत् ॥



Meaning - A person who is in a state of impurity must indeed not perform the act of worshipping the deity. He/she who performs it out of delusion, that act of his shall become fruitless.



According to Kularnava Tantra - Chapter 9, Verse 88-



न वारिणा शुध्यते देही नान्तःशौचेन शुध्यति । अन्तःशौचेन शुध्यन्ति तस्मादन्तः शुचिर्भवेत् ॥



The embodied atma is not purified by water, nor is it purified without internal purity. It is by internal purity that beings are purified; therefore, one should be pure within.



According to Garuḍa Puraṇ - Parva Khaṇḍa, Chapter 222 -



अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥



Whether a person is impure or pure, or even if he/she has passed through all possible states (of impurity), he/she who remembers the Lotus-eyed god (Vishnu) becomes pure both externally and internally.



Manusmrti - Chapter 2, Verse 60-



अद्भिः गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।

विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥



The limbs of the body are purified by water, the mind is purified by truth; the individual atma is purified by learning and austerity; and the intellect is purified by knowledge.



Aapka Apna

Aachaarya Deepak Sikka

Founder Graha Chaal Consultancy

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ॐ नमः शिवाय।



वेदों में प्रयुक्त काम शब्द या वासना केवल यौन इच्छाएँ नहीं हैं बल्कि इसमें सभी प्रकार के भौतिक सुख भी सम्मिलित हैं।

इस प्रकार वासना कई रूप दर्शाती है। जैसे:-

धन की इच्छा,

शारीरिक लालसाएँ,

प्रतिष्ठा की अभिलाषा,

सत्ता की भूख इत्यादि।

वासना केवल भगवान के प्रति प्रेम का विकृत प्रतिबिंब है जो कि प्रत्येक जीवित प्राणी का अंतर्निहित स्वभाव है।

जब आत्मा शरीर से संयुक्त होकर माया शक्ति के सम्पर्क में आती है तब तमोगुण के संयोग से इसका दिव्य प्रेम वासना में परिवर्तित हो जाता है।

दिव्य प्रेम भगवान की सर्वोच्च शक्ति है। अतः भौतिक क्षेत्र में इसका विकृत स्वरूप जो कि काम वासना है, वह भी अति प्रबल शक्ति है।

श्रीकृष्ण ने सांसारिक सुखों के भोग की लालसा को पाप के रूप में चिह्नित किया है क्योंकि यह प्रलोभन हमारे भीतर छिपा रहता है।

रजोगुण आत्मा को यह विश्वास दिलाता है कि सांसारिक विषय भोगों से ही तृप्ति प्राप्त होगी। इसलिए किसी भी मनुष्य में इन्हें प्राप्त करने की कामना उत्पन्न होती है।

जब कामना की पूर्ति होती है तब इससे लोभ उत्पन्न होता है और इसकी संतुष्टि न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।

कामना, लोभ और क्रोध इन तीनों विकारों से ग्रस्त होकर मनुष्य पाप करता है।

लोभ कामनाओं का प्राबल्य है जबकि क्रोध कुण्ठित इच्छा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वासना या कामना को सभी बुराइयों की जड़ के रूप में चिह्नित किया है।



आपका अपना

आचार्य दीपक सिक्का

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Aum Namah Shivay.



There are many great sages and devotees in Hindu tradition whose lives teach powerful spiritual lessons, Here are a few important ones with key points:



1️⃣ Valmiki

• Originally a forest robber named Ratnakara.

• Transformed into a great sage through devotion and meditation.

• Author of the sacred epic Ramayana.

• Known as the Adi Kavi (first poet) in Sanskrit literature.

Lesson: Anyone can transform through devotion and sincere repentance.



2️⃣ Ved Vyasa

• Compiler of the Vedas and author of the Mahabharata.

• Also composed the Bhagavata Purana and many other Puranas.

• Known as one of the greatest sages in Hindu tradition.

Lesson: Knowledge and wisdom guide humanity toward dharma.



3️⃣ Prahlada

• A great devotee of Lord Vishnu even as a child.

• Son of the demon king Hiranyakashipu.

• Protected by Lord Vishnu in the form of Narasimha.

Lesson: True devotion protects a devotee in every situation.



4️⃣ Dhruva

• A young prince who performed intense meditation to see Lord Vishnu.

• Blessed by Vishnu and became the Dhruva Star (Pole Star) in the sky.

Lesson: Determination and devotion bring divine blessings.



5️⃣ Shabari

• A humble devotee who waited many years to see Lord Rama.

• Offered fruits to Rama with pure love and devotion.

Lesson: God values pure devotion more than wealth or status.



Common Message from all these stories:

• Faith in God

• Devotion (Bhakti)

• Righteous living (Dharma)

• Transformation through sincerity

These teachings appear in sacred texts like the Ramayana, Mahabharata, and the Bhagavata Purana.



Aapka Apna

Aachaarya Deepak Sikka

Founder of Graha Chaal Consultancy

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ॐ नमः शिवाय

रुका हुआ धन प्राप्त करने के उपाय

1. पीपल को जल अर्पित करें (शनिवार)

शनिवार की सुबह पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और सात परिक्रमा करें। इससे शनि की कृपा मिलती है और रुका हुआ धन मिलने में सहूलियत होती है।


2. सरसों के तेल का दीपक जलाना

शनिवार की संध्या को पीपल के नीचे या शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएँ। यह बाधाओं को दूर करता है।


3. गोमती चक्र या श्री यंत्र की स्थापना

शुक्रवार के दिन घर के पूजा स्थान या तिजोरी में गोमती चक्र या श्री यंत्र स्थापित करें। धूप-दीप दिखाकर ही रखें। यह धन के स्थायित्व और प्रवाह को बढ़ाता है।


4. दान करना

शनिवार को काले तिल, सरसों का तेल या काले वस्त्र का दान किसी गरीब को करें। इससे ग्रह दोष शांत होते हैं और अटका हुआ धन वापस आने लगता है।


5. मंत्र जाप

प्रतिदिन सुबह 108 बार “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जप करें। यह धन-संपत्ति आकर्षित करने और अड़चनें दूर करने में बेहद प्रभावी है।

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आचार्य दीपक सिक्का
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ॐ नमः शिवाय

अबूझ मुहूर्त का पाखण्ड

आजकल एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है कि लोग अपने विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत या अन्य शुभ कार्यों के लिए ज्योतिषीय मुहूर्त पूछने के बजाय कुछ पर्वों और त्योहारों को ही “अबूझ मुहूर्त” मानकर उसी दिन कार्य सम्पन्न कर लेते हैं। यह प्रवृत्ति शास्त्रीय परंपरा की दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती।

वास्तव में मुहूर्त शास्त्र अत्यन्त सूक्ष्म और वैज्ञानिक प्रणाली है, जिसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, ग्रहस्थिति, लग्न आदि अनेक तत्वों का विचार करके ही किसी कार्य के लिए अनुकूल समय निर्धारित किया जाता है। यदि इन सभी सिद्धान्तों की उपेक्षा करके केवल किसी पर्व को ही स्वतः शुभ मान लिया जाए, तो यह मुहूर्त शास्त्र की मूल भावना के विरुद्ध है।

१. चैत्र नवरात्रि

बहुत से लोग मानते हैं कि चैत्र नवरात्रि में सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं। परंतु इस समय प्रायः सूर्य मीन राशि में होते हैं और यह काल मीन संक्रांति अथवा खरमास के अंतर्गत आता है। शास्त्रों में इस अवधि में विवाह आदि मांगलिक कार्य सामान्यतः वर्जित बताए गए हैं।

२. गणेश चतुर्थी

भगवान गणेश की उपासना का यह अत्यंत पवित्र पर्व है, परंतु ज्योतिष की दृष्टि से चतुर्थी तिथि ‘रिक्ता तिथि’ मानी गई है, जो मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं कही जाती।

३. रामनवमी

रामनवमी भगवान श्रीराम के प्राकट्य का महापर्व है। परंतु ज्योतिषीय मतानुसार नवमी भी रिक्ता तिथि मानी जाती है, इसलिए विवाह या गृहप्रवेश जैसे कार्यों के लिए इसे सामान्यतः उपयुक्त नहीं माना जाता।

४. महाशिवरात्रि

यह शिवभक्तों के लिए महान साधना का पर्व है, किंतु यह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आता है, जिसे अधिकांश मांगलिक कार्यों में अनुकूल नहीं माना गया है।

५. विजयादशमी

दशहरा अत्यंत शुभ और विजयोत्सव का दिन माना जाता है। इस दिन शस्त्रपूजन, शिक्षा आरम्भ या नया कार्य प्रारम्भ करना श्रेष्ठ माना गया है, परंतु अनेक परंपराओं में चातुर्मास के दौरान विवाह आदि संस्कारों को वर्जित बताया गया है।

६. दीपावली

दीपावली लक्ष्मीपूजन और आध्यात्मिक उत्सव का महान पर्व है, परंतु यह अमावस्या तिथि को आता है, जो सामान्यतः मांगलिक संस्कारों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अधिकांश व्रत-पर्वों का उद्देश्य भगवान का स्मरण, उपासना और आध्यात्मिक साधना है, न कि विवाह या अन्य सांसारिक कार्यों का आयोजन।

यदि केवल सुविधा या भीड़ के कारण इन पर्वों को “अबूझ मुहूर्त” घोषित कर दिया जाए, तो यह शास्त्रीय मुहूर्त विचार की परंपरा को कमजोर करता है। अतः उचित यही है कि किसी भी मांगलिक कार्य के लिए शास्त्रसम्मत मुहूर्त का विचार करके ही कार्य किया जाए।

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संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी

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ॐ नमः शिवाय।



मन की चिकित्सा ग्रहों के माध्यम से (तत्व-आधारित नवग्रह उपायों का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण)



वैदिक ज्योतिष में नवग्रह — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु — हमारे आंतरिक और बाहरी संसार को प्रभावित करते हैं। जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और अन्न/शरीर से जुड़े पारंपरिक उपाय केवल अंधविश्वास नहीं हैं, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव रखते हैं।



मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ये उपाय अवचेतन प्रतीकों को सक्रिय करते हैं, सजगता बढ़ाते हैं और भावनात्मक संतुलन के लिए मस्तिष्क की न्यूरल संरचनाओं को पुनः प्रशिक्षित करते हैं।



प्रत्येक तत्व एक मानसिक कार्य से जुड़ा है:



जल – भावना और प्रवाह



अग्नि – इच्छा शक्ति और दिशा



पृथ्वी – स्थिरता और ग्राउंडिंग



वायु – विचार और श्वास



अन्न/शरीर – पोषण और आत्म-मूल्य





इनके साथ कार्य करने से ज्योतिष अमूर्त विचार न रहकर एक जीवंत, उपचारात्मक अनुष्ठान बन जाता है।





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🌞 सूर्य: प्राणशक्ति, अहं, उद्देश्य



जल उपाय: प्रतिदिन प्रातः उगते सूर्य को अर्घ्य देना केवल कर्मकांड नहीं है; यह आत्मविश्वास और उद्देश्य की भावना को मन में स्थापित करता है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके तांबे के लोटे से जल अर्पित करना अहं के समर्पण का प्रतीक है। प्रातः सूर्य प्रकाश से सेरोटोनिन बढ़ता है और यह अभ्यास आत्म-विश्वास को मजबूत करता है।



अग्नि उपाय: सूर्योदय पर घी का दीपक जलाकर उसमें शांत दृष्टि से देखना संकल्प-शक्ति को मजबूत करता है। यह मस्तिष्क को दिशा चुनने का अभ्यास कराता है।



पृथ्वी उपाय: नंगे पांव धरती पर खड़े होकर सूर्य की ओर देखना शरीर को स्थिरता देता है। यह तनाव घटाता है और आत्मविश्वास की देहगत स्मृति बनाता है।



वायु उपाय: 5 मिनट सूर्यभेदी प्राणायाम तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है और आलस्य दूर करता है।



अन्न/शरीर उपाय: सूर्य अर्घ्य के बाद हल्का, सात्त्विक और गरम नाश्ता आत्म-सम्मान और अनुशासन का भाव बढ़ाता है।





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🌙 चंद्र: भावना, अंतर्ज्ञान, सुरक्षा



जल उपाय: शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल से अभिषेक मन को शांत करता है और भावनात्मक तनाव को बाहर निकालता है।



अग्नि उपाय: पूर्णिमा की रात जल पात्र में दीपक का प्रतिबिंब देखना भावना और स्पष्टता का संतुलन बनाता है।



पृथ्वी उपाय: चंद्र दर्शन करते हुए धरती को स्पर्श करना शरीर को सुरक्षा का अनुभव कराता है।



वायु उपाय: सोने से पहले 4 गिनती में श्वास और 6 गिनती में श्वास-त्याग चिंता कम करता है।



अन्न/शरीर उपाय: हल्का रात्रि भोजन और कम उत्तेजना भावनात्मक स्वच्छता का अनुष्ठान बन जाता है।





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🔴 मंगल: कर्म, क्रोध, साहस



जल उपाय: श्रमिकों को जल देना आक्रोश को सेवा में बदलता है।



अग्नि उपाय: कार्य से पहले लाल दीपक जलाना लक्ष्य पर एकाग्रता बढ़ाता है।



पृथ्वी उपाय: नंगे पांव चलना या व्यायाम करना क्रोध को सुरक्षित रूप से बाहर निकालता है।



वायु उपाय: कपालभाति प्राणायाम मानसिक अशांति को शुद्ध करता है।



अन्न/शरीर उपाय: अदरक, काली मिर्च जैसे हल्के मसाले संतुलित रूप से मंगल ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं।





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🟢 बुध: बुद्धि, संवाद, अनुकूलन



जल उपाय: प्रतिदिन पौधों को पानी देना मन को स्थिर करता है।



अग्नि उपाय: पढ़ाई से पहले दीपक जलाना ध्यान को प्रशिक्षित करता है।



पृथ्वी उपाय: एक ही स्थान पर बैठकर हाथ से लिखना एकाग्रता बढ़ाता है।



वायु उपाय: नाड़ी शोधन प्राणायाम विचारों को संतुलित करता है।



अन्न/शरीर उपाय: हल्का और रेशा युक्त भोजन मानसिक स्पष्टता देता है।





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🟡 गुरु: ज्ञान, आस्था, विस्तार



जल उपाय: मंदिर में जल दान कृतज्ञता और उदारता का भाव बढ़ाता है।



अग्नि उपाय: गुरुवार को दीपक जलाकर शास्त्र पढ़ना मन को स्थिर करता है।



पृथ्वी उपाय: धरती पर बैठकर चिंतन करना विचारों को जीवन में उतारता है।



वायु उपाय: मंत्रोच्चार या सकारात्मक वाक्य बोलना तंत्रिका तंत्र को शांत करता है।



अन्न/शरीर उपाय: प्रसाद ग्रहण करना भोजन को पवित्र अनुभव बनाता है।





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💕 शुक्र: प्रेम, सौंदर्य, सुख



जल उपाय: मीठा शरबत बांटना संबंधों में मिठास लाता है।



अग्नि उपाय: सुगंधित दीपक या अगरबत्ती सौंदर्य बोध जगाती है।



पृथ्वी उपाय: फूलों और पौधों के साथ काम करना आत्म-मूल्य बढ़ाता है।



वायु उपाय: संगीत के साथ श्वास-प्रश्वास सामंजस्य बढ़ाता है।



अन्न/शरीर उपाय: सुंदर ढंग से भोजन बनाकर साझा करना संबंध चिकित्सा है।





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⚫ शनि: अनुशासन, समय, कर्म



जल उपाय: वृद्धों को जल सेवा करुणा जगाती है।



अग्नि उपाय: शनिवार को तिल के तेल का दीपक धैर्य का प्रतीक है।



पृथ्वी उपाय: रोज थोड़ा सफाई कार्य आदत निर्माण करता है।



वायु उपाय: प्रतीक्षा करते समय मोबाइल न देखना सहनशीलता सिखाता है।



अन्न/शरीर उपाय: सप्ताह में एक दिन सरल भोजन संयम सिखाता है।





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🌪 राहु: आसक्ति, भ्रम, लालसा



जल उपाय: पक्षियों के लिए जल रखना अनासक्ति सिखाता है।



अग्नि उपाय: दीपक देखकर विचारों को केवल “विचार” मानकर जाने देना माइंडफुलनेस है।



पृथ्वी उपाय: पेड़ या दीवार से पीठ लगाकर बैठना भ्रम को तोड़ता है।



वायु उपाय: विचार लिखकर फिर गहरी श्वास लेना चिंता कम करता है।



अन्न/शरीर उपाय: निर्णय के दिनों में अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन से बचना मन को सुरक्षित रखता है।





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🌑 केतु: वैराग्य, आध्यात्म, पूर्व कर्म



जल उपाय: आवारा पशुओं को जल देना करुणा और मुक्ति का अभ्यास है।



अग्नि उपाय: मंद प्रकाश में दीपक के साथ आत्म-प्रश्न (“यह कौन अनुभव कर रहा है?”) अवचेतन को उजागर करता है।



पृथ्वी उपाय: प्रतिदिन कुछ मिनट मौन में धरती पर बैठना आंतरिक शांति देता है।



वायु उपाय: विचारों को बादलों की तरह आते-जाते देखना साक्षी भाव सिखाता है।



अन्न/शरीर उपाय: कभी-कभी सादा भोजन आत्म-नियंत्रण सिखाता है।





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प्लेसबो और अर्थ प्रभाव



ये उपाय इसलिए भी काम करते हैं क्योंकि मन उन्हें अर्थ देता है। “प्लेसबो” नकली नहीं, बल्कि मस्तिष्क की उपचार शक्ति का सक्रिय होना है।



सुरक्षा और नैतिकता



उपाय अहिंसक हों। भय नहीं, सशक्तिकरण का भाव रखें। यह चिकित्सा या मनोचिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक अभ्यास हैं।



व्यक्तिगत चयन



1–2 उपाय चुनें जो भावनात्मक रूप से आपको सच्चे लगें। 21–43 दिन तक स्वयं पर प्रयोग करें और बदलाव देखें।



सांस्कृतिक व प्रतीकात्मक स्तर



ये उपाय तीन स्तरों पर काम करते हैं —



प्रतीकात्मक (archetype)



मनोवैज्ञानिक (व्यवहार, भावना, विचार)



ऊर्जात्मक/आध्यात्मिक (जो इसमें विश्वास करते हैं)





आधुनिक चिकित्सा से एकीकरण



जल = भावनात्मक संतुलन



अग्नि = प्रेरणा और लक्ष्य



पृथ्वी = ग्राउंडिंग और आदत निर्माण



वायु = श्वास और विचार नियंत्रण



अन्न = आत्म-देखभाल और सीमाएं





अशांत संसार में ये देह-आधारित उपाय हमें याद दिलाते हैं:

सच्चा उपचार तब होता है जब संकल्प और कर्म जीवन के हर स्तर पर एक हो जाते हैं।



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आचार्य दीपक सिक्का

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ॐ नमः शिवाय।



पीड़ा और समस्याओं के पीछे का विज्ञान, साधना के गुप्त प्रभाव जो सामान्य धारणा से भिन्न होते हैं, ज्योतिषीय नियम जो पुस्तकों के अनुसार काम नहीं करते।



हम में से अधिकांश जो आध्यात्मिक क्षेत्रों में गहराई से उतरते हैं, उन्होंने अनगिनत स्तर की पीड़ा और आघात का अनुभव किया है। यह सार्वभौमिक नहीं है, लेकिन बड़े पैमाने पर ऐसा होता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाएं लगातार होती रहती हैं, जो हमारे भीतर की अच्छाई को चुनौती देती हैं। अक्सर पूछा जाता है कि ऐसा क्यों होता है और इतनी क्रूरता से क्यों होता है, और सबसे महत्वपूर्ण, इतनी बार क्यों होता है? चलिए जानते हैं:-



🦜 सबसे पहले, यह केवल सच्चे साधक के साथ होता है। यह जीवन में नकारात्मक तत्वों द्वारा उत्पन्न प्रभावों के समान भी है। इसलिए, इन दोनों के बीच अंतर करना आवश्यक है और जाहिर है कि जो व्यक्ति पीड़ित है, वह इसका कारण नहीं समझ सकता क्योंकि उसका मन उस स्तर पर नहीं होता है कि वह मूल कारण को समझ सके।



🦜 नियमित परीक्षण होते रहेंगे। आपको धन अर्जित करने के अवसर मिलेंगे जिसमें दूसरों को धोखा देना, कामुक लालच से मार्ग से भटकना, विरोधियों को नुकसान पहुँचाने के मौके, और जब आप गरीबी के चरम पर होंगे, तब गलत तरीके से धन का आगमन। जब आपकी आत्मा बुराइयों की ओर गिरती है, तो ब्राह्मण उसी क्षण आपको छोड़ देता है। आप अमीर, धनी और भ्रष्ट साधक बन जाते हैं।



🦜 जब आप साधना करते हैं या जब आप किसी आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति से मिलते हैं या जब आप किसी देवता की नजरों में महत्वपूर्ण हो जाते हैं, तो आपके द्वारा किए गए कर्मों के परिणाम तीव्र हो जाते हैं। यह केतु और राहु दोनों के कारण होता है क्योंकि परब्रह्मण हमें बंधनों से मुक्त करना चाहता है। सबसे पहले वह हमारे कर्म बंधनों को कम करता है, और इसी के परिणामस्वरूप जीवन में सबसे खराब घटनाओं की बाढ़ आ जाती है।



🦜 पीड़ा की तीव्रता और लगातार होने वाली घटनाएं यह दर्शाती हैं कि भगवान हम पर किस प्रकार कार्य कर रहे हैं। यह हमारे कर्म ऋणों के स्तर को भी इंगित करता है। इसलिए जब यह सब हो रहा हो, तो धैर्य बनाए रखना आवश्यक है।



🦜 साधक कभी मरता नहीं है, वह हमेशा अंतिम क्षण में बच जाता है, उसे हमेशा दिव्य सहायता मिलती है, और हमेशा एक अदृश्य सहायता होती है। इष्ट देवता से जुड़े किसी भी ग्रह द्वारा यह प्रभाव उत्पन्न होता है। जो ग्रह अत्यधिक शुभ, उच्च अवस्था में हो, वह सामान्य रूप से (केवल साधक के लिए) बुरा दशा देता है। यह ठीक उसके विपरीत होता है जो ग्रंथों में लिखा होता है। भौतिक लाभ की कमी और आध्यात्मिक अनुभवों की प्रचुरता होती है। हालांकि, आपको धन तब मिलेगा जब जरूरत होगी।



🦜 जब आप आध्यात्मिक रूप से ऊँचे हो जाते हैं, तो बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। हालांकि, भगवान यह सुनिश्चित करते हैं कि आपको किसी भी प्रकार के आनंद से वंचित रखा जाए। आप ध्यानमग्न हो जाते हैं, और भले ही आपको जीवन में हर भौतिक या अन्य रूप में सब कुछ मिल जाए, आप उसका आनंद नहीं ले पाएंगे। यह आपके लिए अर्थहीन हो जाएगा।



🦜 कुछ शारीरिक लक्षणों में साधना के दौरान झटके आना, सम्मोहन की स्थिति, दूसरों के बारे में सब कुछ जानना, हर पल में खुश रहना, शत्रुता की कमी, अभिमान, ईर्ष्या, काम व अन्य पापों की कमी शामिल है। आप भगवान को हर जगह देखते हैं और वही करते हैं जो वे आपसे कहते हैं। आप वास्तव में कोई नहीं बन जाते हैं।



🦜 उच्च ग्रह, आत्मकारक और अमात्यकारक अच्छे होने के बावजूद बुरे परिणाम देंगे। कोई भी भौतिक लाभ गायब हो जाएगा। राहु पंचम और केतु एकादश में या इसके विपरीत होने पर स्थिति तीव्रतम हो जाती है ताकि ऋणों को कम किया जा सके। केतु इसे बहुत बुरे तरीके से करता है। राहु भ्रम और जाल तैयार करता है।



🦜 मजबूत षष्ठमेश (छठे घर का स्वामी) वर्षों की तपस्या और पीड़ा का कारण बनेगा क्योंकि हमें संसार को बहुत कुछ लौटाना है। व्यक्ति पर उपाय काम नहीं करेंगे क्योंकि वह भगवान का है।



आपका अपना

आचार्य दीपक सिक्का

संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी

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ॐ नमः शिवाय



भारत के संन्यासी (समयरेखा और योगदान)



वयम् अमृतस्य पुत्राः (श्वेताश्वतरोपनिषद्)



अमृतस्य पुत्रा वयं, सबलं सदयं नो हृदयम्।

गतमितिहासं पुनरुन्नेतुं, युवसङ्घटनं नवमिह कर्तुम्॥



भारतकीर्तिं दिशि दिशि नेतुं, दृढसंकल्पा विपदि विजेतुम्।

ऋषिसन्देशं जगति नयेम, सत्त्वशालिनो मनसि भवेम॥



कष्टसमुद्रं सपदि तरेम, स्वीकृतकार्यं न हि त्यजेम।

दीनजनानां दुःखविमुक्तिं, महतां विषये निर्मलभक्तिम्॥



सेवाकार्ये सन्ततशक्तिं, सदा भजेम भगवति रक्तिम्।

सर्वे अमृतस्य पुत्राः शृण्वन्तु ये दिव्यानि धामानि आतस्थुः॥



युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥

(श्वेताश्वतरोपनिषद् – द्वितीय अध्याय)





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भारत की आध्यात्मिक धरोहर उसके संतों, ऋषियों और रहस्यवादी साधकों के जीवन से सदैव प्रकाशित होती रही है।

हम अमरत्व की संतान हैं, इसलिए हमारे हृदय बलवान और करुणामय हों।

आओ, हम भूले हुए इतिहास को पुनर्जीवित करें और एक नवीन युवा संगठन का निर्माण करें।



भारत की कीर्ति चारों दिशाओं में फैले और विपत्ति में भी दृढ़ संकल्प के साथ हम विजयी बनें।

ऋषियों के संदेश को विश्व तक पहुँचाएँ और अपने चरित्र को उत्तम विचारों से समृद्ध करें।



कष्टों के सागर को शीघ्र पार करें और जो कार्य हमने स्वीकार किया है उसे कभी न छोड़ें।

दीन-दुखियों की पीड़ा दूर करने का प्रयास करें और महान आत्माओं के प्रति निर्मल भक्ति रखें।



सेवा कार्य में निरंतर शक्ति बनी रहे और हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम सदा जाग्रत रहे।

अमृत के पुत्र—जो दिव्य लोकों को प्राप्त हुए हैं—उनके वचनों को सुनें और अनुसरण करें।





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वेद कहते हैं कि समस्त प्राणी अमर और अविनाशी परमात्मा की संतान हैं।

जैसे संतान अपने पिता के गुणों को धारण करती है, वैसे ही वेद के अनुसार हम भी अमर स्वरूप हैं।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है—संसार की प्रत्येक वस्तु निरंतर बदलती रहती है।



संपूर्ण ब्रह्मांड में जन्म, मृत्यु, निर्माण और विनाश की प्रक्रिया हर क्षण चलती रहती है।

शरीर माता-पिता से जन्म लेता है, पर प्रकृति के नियम के अनुसार जड़ या चेतन कोई भी वस्तु सदा एक-सी नहीं रहती।



अतीत की ऐतिहासिक विरासत को पुनः जाग्रत करने के लिए युवाओं को संगठित होकर नए भारत का निर्माण करना चाहिए।

वे महान संत स्मरणीय हैं जिन्होंने धर्म, संस्कृति और समाज के कल्याण के लिए दिव्य जीवन जिया।



भारत की महिमा को चारों दिशाओं में फैलाएँ और दृढ़ निश्चय के साथ संकटों में विजयी हों।

ऋषियों के संदेश को विश्व में प्रचारित करें और अपने व्यक्तित्व को उत्तम विचारों से अलंकृत करें।



भक्ति के साथ सेवा करें और ईश्वर के प्रति आध्यात्मिक उत्साह को विकसित करें।

अमृत के पुत्र—दिव्य संस्थानों, तीर्थों, संतों और महापुरुषों के पदचिह्नों का अनुसरण करें और उनके उपदेश आत्मसात करें।



नीचे दिए गए महान व्यक्तित्व “अमृतपुत्र” कहे जाते हैं, जिनकी शिक्षाओं और कर्मों ने पीढ़ियों को प्रभावित किया है:



(संक्षिप्त हिंदी रूपांतरण)



1. बुद्ध (563–483 ई.पू.) – करुणा, अहिंसा और चार आर्य सत्यों का उपदेश; एशिया में शांति का मार्ग।





2. महावीर (599–527 ई.पू.) – अहिंसा, सत्य और तपस्या; जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर।





3. आदि शंकराचार्य (502 ई.पू.) – अद्वैत वेदांत के आचार्य; चार मठों की स्थापना।





4. रामानुजाचार्य (1017–1137) – विशिष्टाद्वैत वेदांत; भक्ति और समरसता।





5. गुरु नानक (1469–1539) – सिख धर्म के प्रवर्तक; समानता और सेवा का संदेश।





6. कबीर (1440–1510) – निर्गुण भक्ति; जाति-पंथ का विरोध।





7. तुलसीदास (1532–1623) – रामचरितमानस के रचयिता।





8. चैतन्य महाप्रभु (1486–1534) – संकीर्तन और कृष्ण प्रेम का प्रचार।





9. गोरखनाथ (10–11वीं शताब्दी) – नाथ योग परंपरा के प्रवर्तक।





10. लाहिड़ी महाशय (1828–1895) – क्रिया योग का प्रचार।





11. रामकृष्ण परमहंस (1836–1886) – धर्म समन्वय और रामकृष्ण मिशन की प्रेरणा।





12. स्वामी विवेकानंद (1863–1902) – वेदांत और योग का विश्व प्रचार।





13. श्री अरविंद (1872–1950) – समग्र योग और आध्यात्मिक उत्क्रांति।





14. तोतापुरी (18वीं शताब्दी) – अद्वैत साधक; रामकृष्ण के गुरु।





15. देवरहा बाबा (20वीं शताब्दी) – दीर्घायु और सेवा।





16. जलाराम बापा (1799–1881) – दया और सेवा के प्रतीक।





17. विशुद्धानंद परमहंस (1853–1937) – तंत्र, योग और भक्ति का समन्वय।





18. त्रैलंग स्वामी (1607–1887) – महान योगी, दीर्घायु।





19. पद्मपादाचार्य – शंकराचार्य के प्रमुख शिष्य।





20. नित्यानंद प्रभु – चैतन्य आंदोलन के सहचर।





21. भक्त हरिदास – मीरा बाई के गुरु।





22. सनतदासजी – समाज सुधारक संत।





23. मधुसूदन सरस्वती – अद्वैत सिद्धि के रचयिता।





24. विजयकृष्ण गोस्वामी – भक्ति मार्ग के संत।





25. स्वामी प्रणवानंद – भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक।





26. स्वामी गंभीरा नंद – वेदों के अनुवादक।





27. बालनाथजी – नाथ योगी।





28. रामप्रसाद सेन – काली भक्ति के कवि।





29. साधक रामदेव – योग साधक।





30. खथिया बाबा – तपस्वी योगी।





31. रमण महर्षि (1879–1950) – “मैं कौन हूँ?” आत्मविचार।





32. भोला गिरी – करुणा और सेवा।





33. महावतार बाबाजी – क्रिया योग के प्रवर्तक।





34. समर्थ रामदास (1608–1681) – दासबोध के रचयिता।





35. श्री भोलनाथ – योग और सेवा।





36. लोकनाथ ब्रह्मचारी (1730–1890) – तपस्या और चमत्कार।





37. जगतबंधु प्रभु (1871–1921) – भक्ति और समाज सेवा।







ये संत अद्वैत, भक्ति, तंत्र, योग और समाज सुधार—भारत की आध्यात्मिक विविधता के प्रतीक हैं।



इन संतों ने मानव के भीतर छिपे चेतना-रस (अमृत) को जाग्रत किया और धर्म, करुणा, साहस, सत्य और भक्ति का संदेश दिया।

हम अमृत के पुत्र हैं—अर्थात शरीर नश्वर है, पर आत्मा अमर है।



श्वेताश्वतर उपनिषद, भगवद्गीता और अष्टावक्र गीता कहते हैं—बंधन से मुक्त हो, जागरूकता, आनंद और शांति में स्थित हो।

धर्मपूर्वक कर्म करते हुए दिव्य चेतना का अमृत पान करते रहो।



पृथ्वी के संतों का मूल सिद्धांत:

दुखियों की पीड़ा दूर करो और समाज कल्याण में दृढ़ रहो।

मन, वाणी और कर्म को प्रेम, सेवा, संस्कृति और भारतीय धरोहर के संरक्षण में समर्पित करो।

“अमृतस्य पुत्र” को शरीर से नहीं, आत्मा की दृष्टि से समझो और संतों के मार्ग का अनुसरण करो।



भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:

“जातस्य हि ध्रुवं मृत्यु:” – जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है।

अतः शरीर अमर नहीं हो सकता, पर आत्मा जन्म-मरण से परे है।



वेद का महान मंत्र “वयम् अमृतस्य पुत्राः” शरीर नहीं, आत्मा को संबोधित करता है।

अष्टावक्र गीता में कहा गया है:



यदि देह से स्वयं को अलग जानकर आत्मा में स्थित हो जाओ,

तो उसी क्षण तुम सुखी, शांत और बंधनमुक्त हो जाते हो।



आत्म-अमृत के अनुभव के बाद क्या करना चाहिए?

शास्त्र कहते हैं:



यावत जीवेत – सुखं जीवेत, धर्मकार्यं कृत्वा अमृतं पिबेत।



जब तक जियो, सुखपूर्वक जियो;

धर्म के अनुसार कर्म करो, परोपकार में लगे रहो और ज्ञान रूपी अमृत का पान करते रहो।



आपका अपना

आचार्य दीपक सिक्का

संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी

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