Quotes by Aachaarya Deepak Sikka in Bitesapp read free

Aachaarya Deepak Sikka

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*ॐ नमः शिवाय*

*अतिवर्ती नक्षत्र उस स्थिति को कहते हैं जब कोई ग्रह किसी नक्षत्र में अत्यधिक तीव्र गति से प्रवेश करके बहुत कम समय में उसे पार कर जाता है।*

सरल शब्दों में

सामान्यतः कोई ग्रह एक नक्षत्र में निश्चित अवधि तक रहता है।

लेकिन जब वह अपनी औसत गति से अधिक तेज चलता है और नक्षत्र में टिके बिना शीघ्र निकल जाता है, तो उस नक्षत्र में उसकी स्थिति अतिवर्ती (Ativarti) कहलाती है।


ज्योतिषीय विशेषताएँ

अतिवर्ती ग्रह फल को जल्दी देता है, परन्तु

फल अस्थिर, अचानक या अल्पकालिक होता है।

ऐसा ग्रह व्यक्ति के जीवन में

अचानक घटनाएँ

शीघ्र लाभ या हानि

अधूरापन या जल्दबाज़ी

मानसिक अस्थिरता
जैसे प्रभाव दे सकता है।



किन ग्रहों में अतिवर्तन अधिक देखा जाता है

*चन्द्रमा (सबसे अधिक)*

बुध

शुक्र

कभी-कभी मंगल


*उदाहरण*

यदि चन्द्रमा किसी जन्मकुंडली में किसी नक्षत्र को अत्यंत शीघ्र पार कर रहा हो, तो उस नक्षत्र के स्वामी और कारकत्व के फल व्यक्ति के जीवन में तेज़ी से आते-जाते देखे जाते हैं।

शास्त्रीय संकेत

अतिवर्ती ग्रह को कभी-कभी

*अल्पफलदायक*

क्षणिक प्रभाव वाला
भी कहा गया है, जब तक कि वह शुभ भाव, शुभ दृष्टि या योग से समर्थ न हो।

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*ॐ नमः शिवाय*

*गुलिक उपग्रह*

शनि का अंधकारमय संतान: गुलिक आपके घर और आपके कर्म में कैसे बैठता है

कुछ जन्मकुंडलियों में एक बहुत अजीब तरह की छाया होती है। जीवन चलता रहता है, लेकिन परिवार की कहानी में अस्पताल की गंध, अंतिम संस्कार, रक्त जाँच, और स्वास्थ्य संबंधी डर बार-बार लौटते रहते हैं। आचार्य मन्त्रेश्वर इस छाया को गुलिक और मांडी कहते हैं — शनि की संतान — राहु और केतु जितनी ही कठोर, जो हमेशा सूर्य और चंद्रमा (जीवन देने वाले) को विचलित करती रहती हैं।

जब गुलिक या मांडी किसी भी भाव को तीव्र रूप से स्पर्श करते हैं, तो जीवन का वह क्षेत्र दूषित या असुरक्षित सा महसूस होने लगता है। यदि वे चतुर्थ भाव को छुएँ, तो व्यक्ति बार-बार घर बदलता है, या घर बीमारी और तनाव से भारी हो जाता है। यदि वे लग्न या चंद्रमा के साथ हों, तो शरीर उम्र से पहले थका-थका लगता है, बीमारी से अधिक बीमारी का डर बना रहता है, नींद टूटती है, सपने अजीब होते हैं। यदि वे सप्तम या अष्टम भाव पर आक्रमण करें, तो आसपास के करीबी लोगों में ऑपरेशन, दुर्घटनाएँ, अचानक हानियाँ सुनने को मिलती रहती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि “आपकी मृत्यु ऐसे होगी”, बल्कि आप जीवन में बार-बार अंत, अस्पताल और विदाई के दृश्यों के साक्षी बनते हैं।

यह छोटे-छोटे व्यवहारों में भी दिखता है। जिन लोगों पर गुलिक/मांडी का प्रभाव अधिक होता है, वे अक्सर पुराने मेडिसिन, एक्सपायर्ड गोलियाँ, इस्तेमाल किए गए इंजेक्शन के पैकेट, पुराने मेडिकल रिपोर्ट्स और अस्पताल की फाइलें घर के कोनों में सालों तक संभालकर रखते हैं। कई बार मैंने देखा है कि एक खास दराज या डिब्बा होता है, जहाँ ये सारी “मृत्यु की स्मृतियाँ” जमा रहती हैं, और वही डिब्बा बिस्तर के पास या मंदिर के कमरे में ही रखा होता है। कुछ लोग इस्तेमाल की हुई पट्टियाँ, पुराने थर्मामीटर, टूटा हुआ ऑक्सीमीटर, खाली सिरप की बोतलें उसी अलमारी में रखते हैं, जहाँ भगवान की तस्वीर, अगरबत्ती और कुमकुम भी रखा होता है। प्रदूषण का ग्रह सचमुच देवता-स्थान के साथ बैठ जाता है।

एस्ट्रो वास्तु इसे बहुत स्पष्ट दिखाता है। गुलिक-प्रकार की ऊर्जा गंदे कोनों को पसंद करती है—सीढ़ियों के नीचे के स्टोर रूम जहाँ जाले और धूल जमी हो, बिना वेंटिलेशन के शौचालय, पीछे की बालकनी जहाँ टूटे बाल्टे, पोछे, पुराने जूते और जंग लगे लोहे फेंके रहते हैं। यदि ऐसा कोई कोना सीधे आपके बेडरूम, रसोई या घर के मंदिर की दीवार से सटा हो, तो मन बिना कारण भारी, उदास और डरा-डरा सा रहने लगता है। मांडी के प्रभाव वाले कई घरों में नालियों, गटर, सेप्टिक टैंक या मुख्य द्वार के बाहर गंदे पानी की समस्या बनी रहती है। व्यक्ति कहता रहता है, “पता नहीं क्यों, घर के बाहर हमेशा गंदगी रहती है,” और साथ ही सोचता है कि अंदर शांति क्यों नहीं है।

उपाय केवल मंत्र से शुरू नहीं होता। पहला उपाय है “शुद्धि” — सफ़ाई। यदि आपको लगता है कि आपके जीवन में अस्पताल-ऊर्जा बहुत अधिक है, तो सबसे पहले देखें कि आप मेडिकल फाइलें और दवाइयाँ कहाँ रखते हैं। उन्हें बेड के हेडबोर्ड और मंदिर से दूर करें। दक्षिण या पश्चिम दीवार की किसी व्यावहारिक जगह पर एक साफ़, बंद शेल्फ बनाएं, केवल वर्तमान दवाइयाँ रखें और एक्सपायर्ड दवाओं को सम्मानपूर्वक हटा दें। शौचालय और नाली वाले स्थानों की अच्छी तरह सफ़ाई करें। यदि घर के बाहर कोई कोना स्थायी रूप से गंदा रहता है जहाँ कचरा जमा होता है, तो सप्ताह में कम से कम एक बार वहाँ फिनाइल मिला पानी डालें और प्रार्थना करें—
“जो भी नीचा, गंदा, दुखद है, वह यहीं रुक जाए, घर के भीतर न आए।”

आध्यात्मिक रूप से, इस छाया से सूर्य और चंद्रमा की रक्षा आवश्यक है। प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्वच्छ जल से सरल सूर्य अर्घ्य दें और सच्चे मन से प्रार्थना करें—
“हे सूर्यदेव, मेरी प्राणशक्ति को बलवान और मेरे मन को स्पष्ट रखिए।”
यह धीरे-धीरे भय को काटता है। सोमवार को, यदि बड़ा व्रत न भी कर सकें, तो रात में भारी भोजन से बचें, अधिक सादा पानी पिएँ, और किसी शांत ज्योतिर्लिंग या चंद्रमा की तस्वीर के सामने पाँच मिनट शांत बैठकर केवल श्वास-प्रश्वास पर ध्यान दें। गुलिक/मांडी योग वालों के लिए नियमित महामृत्युंजय जप (केवल 11 बार प्रतिदिन भी) सच्ची श्रद्धा से किया जाए तो सौ अलग-अलग उपायों के पीछे भागने से कहीं अधिक गहराई से काम करता है।

शिव उपासना इस मृत्यु-छाया को थामने का एक अत्यंत सुंदर मार्ग है। उपासना का प्रकार इस बात पर चुना जा सकता है कि आपका जीवन कैसा महसूस हो रहा है।
यदि आप हमेशा दूसरों के दुख से घिरे रहते हैं—अस्पतालों में काम, बीमार रिश्तेदारों की देखभाल—तो चिकना काला पत्थर या नर्मदा शिवलिंग उपयोग करें। उसे स्वच्छ आसन पर रखें, सीधे फर्श पर नहीं। शनिवार को उसमें थोड़ा काला तिल मिला जल अर्पित करें और “मृत्यु से बचाव” नहीं, बल्कि उसके सामने साहस और स्थिरता की प्रार्थना करें।
यदि भय अधिक मानसिक है—पैनिक अटैक, मृत्यु का अत्यधिक चिंतन, अस्पताल जाने का डर—तो स्फटिक (क्रिस्टल) शिवलिंग रखें। उसे शांत, उजले कोने में, संभव हो तो उत्तर-पूर्व में रखें। सादा जल या थोड़ा गुलाब जल से अभिषेक करें और कुछ मिनट शांति से बैठकर स्फटिक पर पड़ती रोशनी को देखें। इससे चंद्रमा में पुनः सत्त्व आता है।
यदि गुलिक आपके कार्य-स्थल और निर्णयों को बाधित कर रहा है, तो कार्य-मेज़ के पास एक छोटी, स्वच्छ शिव की तस्वीर या लिंग रखें, उस क्षेत्र को बहुत साफ रखें—न धूल, न पुराने तार—और कार्यदिवस की शुरुआत एक जागरूक “ॐ नमः शिवाय” से करें।

एक महत्वपूर्ण बात याद रखें: गुलिक और मांडी यह दिखाते हैं कि जीवन आपको कहाँ यह स्वीकार करने को मजबूर करता है कि एक दिन सब कुछ समाप्त होगा। यदि आप इस सत्य से लड़ते हैं, तो भय बढ़ता है। यदि आप इसे स्वीकार कर लेते हैं और जीवन के उस क्षेत्र—शरीर, कमरा, मंदिर, नाली, स्मृति—को साफ कर लेते हैं, तो यही योग आपको संकट में मजबूत, अस्पताल की परिस्थितियों में विवेकशील, और कठिन समय से गुजर रहे दूसरों के प्रति करुणामय बनाते हैं। अनेक अच्छे डॉक्टर, हीलर और कठिन स्थानों पर सेवा करने वाले लोग इन्हीं योगों को लेकर चलते हैं

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*OM NAMAH SHIVAY*

*Why is Khar Masa in Sagittarius (Dhanu) only?*

1. Meaning of Khar Māsa

Khar = donkey (symbol of weakness/slow movement)

Indicates reduced solar strength

Period avoided for auspicious beginnings


2. When does Khar Māsa occur?

When the Sun transits Sagittarius (Dhanu)

Also occurs in Pisces (Mīna)

These are the only two signs considered Khar Māsa


3. Why specifically Sagittarius?

(a) Astronomical reason

Sun moves toward southern declination

Sun’s heat and visibility reduce (Northern Hemisphere)

Symbolic weakening of solar energy


(b) Seasonal reason (Indian context)

Marks winter / cold season

Agricultural and social activities slow down

Nature enters a resting phase


(c) Mythological reason

Sun’s chariot normally has seven horses

During Sagittarius, horses are symbolically replaced by donkeys (khar)

Indicates loss of speed, power, and momentum


(d) Planetary reason

Sagittarius is ruled by Jupiter (Guru)

Sun (ego, authority) entering Guru’s sign signifies humility and restraint

Material beginnings are discouraged


4. Spiritual significance

Encourages nivṛtti (inner discipline)

Suitable for:

Japa

Vrata

Dana

Svādhyāya


Avoided for:

Marriage

Griha-praveśa

New ventures



5. Why not other signs?

Only Sagittarius and Pisces show:

Weak solar transit

Seasonal dormancy

Transitional cosmic energy

Conclusion

Khar Masa occurs in Sagittarius because it represents a phase of weakened solar force, seasonal withdrawal, and spiritual introspection rather than worldly expansion.

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ग्रहों की महादशा तथा अन्तर दशा में प्रदान किए जाने वाले शुभ अथवा अशुभ प्रभाव के कारण __

सूर्य आत्मबल, अहं और सत्ता का ग्रह है। जो व्यक्ति सत्य, धर्म और उत्तरदायित्व से जुड़ा रहता है उसके लिए सूर्य सम्मान, प्रतिष्ठा और नेतृत्व देता है, किंतु अहंकारी, अत्याचारी या कर्तव्यच्युत व्यक्ति के लिए वही सूर्य अपमान, पदहानी और अधिकार से पतन का कारण बनता है।

चंद्र मन, भावना और संवेदना का ग्रह है। संतुलित मन, शुद्ध भाव और करुणा रखने वाले के लिए चंद्र मानसिक शांति, लोकप्रियता और भावनात्मक सुरक्षा देता है, परंतु अस्थिर, भयग्रस्त या छलपूर्ण मन वाले व्यक्ति के लिए चंद्र भ्रम, अवसाद और मानसिक अशांति देता है।

मंगल साहस, ऊर्जा और कर्म का ग्रह है। अनुशासित, परिश्रमी और संयमित जीवन वाले व्यक्ति को मंगल शक्ति, रक्षा और विजय देता है, जबकि क्रोधी, हिंसक या अव्यवस्थित जीवन शैली वाले व्यक्ति को दुर्घटना, विवाद और शारीरिक कष्ट देता है।

बुध बुद्धि, वाणी और विवेक का ग्रह है। सत्यनिष्ठ, अध्ययनशील और स्पष्ट सोच वाले व्यक्ति के लिए बुध सफलता, संवाद-कौशल और व्यावहारिक बुद्धि देता है, किंतु छल, झूठ, चालाकी और गलत तर्क का प्रयोग करने वालों के लिए वही बुध भ्रम, वाणी दोष और निर्णयों में हानि देता है।

गुरु ज्ञान, धर्म और मार्गदर्शन का ग्रह है। श्रद्धा, नैतिकता और गुरु-भाव रखने वालों को गुरु उन्नति, संरक्षण और सद्बुद्धि देता है, परंतु अहंकारी, अधार्मिक या ज्ञान का दुरुपयोग करने वालों के लिए गुरु पतन, अवसरों की हानि और मार्गभ्रष्टता का कारण बनता है।

शुक्र सुख, भोग और संबंधों का ग्रह है। संयम, प्रेम और सौंदर्य-बोध रखने वालों को शुक्र वैभव, प्रेम और कला-सुख देता है, लेकिन भोग-विलास, वासना और अनैतिक संबंधों में लिप्त व्यक्ति के लिए शुक्र रोग, संबंध-विच्छेद और अपयश देता है।

शनि कर्म, अनुशासन और न्याय का ग्रह है। परिश्रम, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा रखने वालों के लिए शनि स्थायित्व, सम्मान और दीर्घकालीन सफलता देता है, जबकि आलसी, छलपूर्ण और जिम्मेदारियों से भागने वालों के लिए वही शनि विलंब, दंड और कठोर अनुभव देता है।

राहु इच्छाओं, भ्रम और असामान्यता का ग्रह है। शोध, साधना और नवीन सोच वाले व्यक्ति के लिए राहु अचानक उन्नति और विशिष्ट पहचान देता है, परंतु नशा, जुआ, लालच और छल में लिप्त व्यक्ति के लिए राहु पतन, बदनामी और आत्मविनाश की ओर ले जाता है।

केतु वैराग्य, मोक्ष और अंतर्मुखता का ग्रह है। आत्मचिंतन, साधना और सत्य की खोज करने वालों को केतु गहन ज्ञान और आध्यात्मिक स्पष्टता देता है, किंतु कर्तव्य से पलायन और भ्रम में रहने वालों के लिए केतु अलगाव, दिशाहीनता और जीवन में शून्यता का अनुभव कराता है।

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पंचक आज से होंगे शुरू
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पांच दिनों के विशेष नक्षत्र संयोग को पंचक कहते हैं। इन पांच दिनों को शुभ और अशुभ कार्यों के लिए देखा जाता है। पंचक के दौरान कुछ कार्य करना बेहद अशुभ माना जाता है। पंचक पंचांग का विशेष भाग है।

क्या है पंचक
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जब चंद्रमा कुंभ से मीन राशि में गुजरता है, तो पंचक का प्रभाव होता है। आमतौर पर इसे पांच महत्वपूर्ण नक्षत्रों में चंद्रमा के गुजरने का समय माना जा सकता है। ये नक्षत्र है - धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, और रेवती। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, या नए निर्माण कार्य से बचना चाहिए।

पंचक अशुभ क्यों माना जाता है?
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कहते हैं पंचक के समय किसी तरह के शुभ काम का परिणाम नहीं मिलता है और उस काम को पांच बार करना पड़ता है। हिंदू धर्म में जब किसी की मृत्यु भी पंचक के दौरान होती है, तो विशेष पूजा पाठ करके पंचक की शांति की जाती है। पंचक के दौरान ये काम बिल्कुल ना करें।
धनिष्ठा नक्षत्र: जरूरी ना हों, तो यात्रा को टालें। गैस, पेट्रोल आदि का काम ना करवाएं। नए घर का वास्तु प्रवेश ना करें।
शतभिषा नक्षत्र: इस समय नया बिजनेस शुरू ना करें। पार्टनरशिप का कोई काम करने से भी बचें।
पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र: इस नक्षत्र में विवाह, नए घर का वास्तु या नई गाड़ी खरीदते हैं, तो यह शुभ नहीं होता है। कार्य करने वाला व्यक्ति बीमार हो जाता है।
उत्तराभाद्रपद नक्षत्र: इस दौरान कोई नया काम शुरू करते हैं, तो असफलता मिलती है।
रेवती नक्षत्र: इस समय काम करने से आर्थइक हानि होने की आशंका बनी रहती है। रेवती भी एक गंडमूल नक्षत्र है और इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति को हर दूसरे महीने बगलामुखी पूजा करनी होती है।

पंचक के प्रकार और उनका प्रभाव
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पंचांग के अनुसार पंचक एक विशेष समय होता है। इसमें किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले सावधानी बरती जाती है। यह पांच दिनों की अवधि होती है। आइए, पंचक के विभिन्न प्रकारों को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि किस पंचक में कौन-कौन से कार्य वर्जित माने गए हैं।

पंचक के पांच प्रकार-
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रोग पंचक यह पंचक तब होता है जब पंचक की शुरुआत रविवार से होती है। इस पंचक के दौरान यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान जैसे कार्य करने से बचना चाहिए।
राज्य या नृप पंचक यदि पंचक की शुरुआत सोमवार से होती है, तो इसे राज्य पंचक या नृप पंचक कहा जाता है। इस समय नौकरी या नई सरकारी योजनाओं में प्रवेश करना वर्जित माना जाता है।
अग्नि पंचक मंगलवार से शुरू होने वाला पंचक अग्नि पंचक कहलाता है। इस समय घर का निर्माण, गृह प्रवेश, या किसी प्रकार की नई संपत्ति से जुड़े कार्य नहीं किए जाने चाहिए।
चोर पंचक शुक्रवार को शुरू होने वाला पंचक चोर पंचक कहलाता है। इस समय यात्रा करने से बचा जाता है, क्योंकि चोरी या धन हानि की आशंका रहती है।
मृत्यु पंचक पंचक यदि शनिवार से शुरू होता है, तो इसे मृत्यु पंचक कहते हैं। इस पंचक के दौरान विवाह, सगाई, और अन्य शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।

पंचक के दौरान करें ये उपाय
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पंचक के दौरान कुछ आसान उपाय करके आप इस समय को शांतिपूर्ण और शुभ बना सकते हैं। पंचक के दौरान निम्नलिखित 5 उपाय करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है:
भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करें।
जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, या धन का दान करें।
पंचक के समय में असहाय गायों को हरा चारा खिलाने से शुभ फल प्राप्त होते हैं
इस समय आप घर या मंदिरों में विशेष पूजा, अनुष्ठान, या हवन करवा सकते हैं।
पंचक के दौरान नाखून और बाल काटने से बचना चाहिए।

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ब्रह्मांड आपकी व्यक्तिगत इच्छाओं या जरूरतों को नहीं समझता, बल्कि आपकी फ्रीक्वेंसी को पहचानता है।

आप जिस फ्रीक्वेंसी पर वाइब्रेट कर रहे होते हैं, उसी के अनुरूप अनुभव आकर्षित करते हैं।

यदि आप डर, अपराधबोध या कमी की भावना में जी रहे हैं, तो नकारात्मक अनुभव आपकी ओर खिंचते हैं।

इसके विपरीत, प्रेम, आनंद और समृद्धि की फ्रीक्वेंसी पर होने से जीवन में सकारात्मक अनुभव आते हैं।

यह ठीक रेडियो ट्यून करने जैसा है-जिस फ्रीक्वेंसी पर ट्यून करेंगे, वही संगीत सुनेंगे। इसलिए, अगर आप अपनी जिंदगी बदलना चाहते हैं, तो अपनी मानसिकता और ऊर्जा बदलें।

ब्रह्मांड हमेशा आपकी ऊर्जा का प्रतिबिंब लौटाता है। सकारात्मक सोच और उच्च फ्रीक्वेंसी जीवन में समृद्धि और सुख को
आकर्षित करती है।

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*ॐ नमः शिवाय*

*वेदों को कण्ठस्थ करना, तथा वैदिक कर्मकाण्ड करना,भगवान की ही भक्ति है।*

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*पद्मपुराण के,पातालखण्ड के,85 वें अध्याय के,5 वें और छठवें श्लोक में,देवर्षि नारदजी ने,महाराज अम्बरीष जी को,वैशाखमास का माहात्म्य श्रवण कराने के पश्चात,महाराज अम्बरीष को,भक्ति के भेद बताते हुए कहा कि-*

*लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा।* *ध्यानधारणया बुद्ध्या*
*वेदानां स्मरणं हि यत्।।5।।*

सूत जी ने कहा कि- हे ऋषियो! भक्ताग्रगण्य महाराज अम्बरीष ने,नारद जी के मुखारविन्द से, वैशाख मास का माहात्म्य श्रवण करने के पश्चात,नारद जी से, भक्तिविषयक प्रश्न करते हुए कहा कि-

हे देवर्षि नारदजी! आप के तो हृदय में,ज्ञान और भक्ति के सहित भगवान नारायण ही निवास करते हैं।
ज्ञान और भक्ति के अगाध तत्त्व को जाननेवाले एकमात्र आप ही हैं। आप तो, ज्ञानियों से तथा भक्तों से सर्वदा ही सत्संग करते रहते हैं,तथा भगवान के नाम का संकीर्तन भी निरन्तर करते रहते हैं।

आप तो,ज्ञान और भक्ति,दोनों के विग्रहस्वरूप ही हैं।

मैं,आपके मुखारविन्द से,भक्ति के स्वरूप का श्रवण करना चाहता हूं।
नारद जी ने कहा कि-

*लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा।।*

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भक्ति,तीन प्रकार की होतीं हैं।

*(1) लौकिकी* *(2)वैदिकी तथा* *(3) आध्यात्मिकी।*
*मनोवाक्कायसम्भवा।*

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ये तीनों प्रकार की भक्ति,मन से,वाक् अर्थात वाणी से तथा काया अर्थात शरीर से होतीं हैं।
भगवान को उद्देश्य करके,व्रत,उपवास, करना,ये मानसिक संकल्प की दृढ़ता पूर्वक भक्ति है।

भगवान के नाम का जप करना,ये भी मानसिक भक्ति है। जिह्वा से भगवान के नाम का संकीर्तन करना,ये वाक् अर्थात वाणी की भक्ति है। भगवान के मंदिर को शुद्ध स्वच्छ रखते हुए,उनके लिए विविध प्रकार के पुष्प,पुष्पमाला,आभूषण,वस्त्र,तथा स्वादिष्ट भोजन आदि निवेदन करना,ये शारीरिक भक्ति है। क्यों कि-बिना शारीरिक परिश्रम के,धन नहीं आता है। शारीरिक परिश्रम करके,धन एकत्रित करके,भगवान के लिए प्रियातिप्रिय वस्तुओं को निवेदित करना,ये शारीरिक भक्ति है।
कायिक,वाचिक तथा मानसिक भक्ति में, एकमात्र भगवान ही उद्देश्य रहते हैं।

लौकिकी वैदिकी इन दोनों प्रकार की भक्ति में, सांसारिक सुखों को प्राप्त करने के उद्देश्य से,की गई भगवान की भक्ति,लौकिकी भक्ति कही जाती है।

*ध्यानधारणबुद्धया वेदानां स्मरणं हि यत्।।*

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लौकिकी भक्ति में,ध्यान से,आध्यात्मिकी भक्ति में,धारणा से,तथा वैदिकी भक्ति में,बुद्धि से भक्ति समझना चाहिए।

*वेदानां स्मरणं हि यत्।*

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वेदों का स्मरण करना,वैदिकी भक्ति है। वेदों को,बुद्धि में स्थिर करना,भी भगवान की भक्ति है। भगवत्स्वरूप वेद हैं,तथा वेदों के मन्त्रों से ही भगवान के स्वरूप का यथार्थज्ञान होता है।

वेदों के अध्ययन से,ज्ञान से ही भगवान के विषय का ज्ञान होता है।
इसी को "बुद्धया"शब्द से वैदिकी भक्ति कहा जाता है।

नेत्र,नासिका,कर्ण,त्वचा और जिह्वा,इन पांचों इन्द्रियों को नियंत्रित करके,एकाग्रचित्त होकर, वेदों का निरन्तर अभ्यास करते हुए,उनके प्रयोग की विधि का ज्ञान करके,देवतात्मक भगवान के लिए,यज्ञ आदि करना "वैदिकी" भक्ति है।
*मंत्रवेदसमुच्चारैरविश्रान्तविचिन्तनै:।।6।।*

वेद के मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करते हुए,उन मंत्रों का, *अविश्रान्त,अर्थात विना विश्राम के,* निरन्तर चिन्तन करना ही वैदिकी भक्ति है।

*जब कोई ब्राह्मण,मंत्रों का उच्चारण करते हुए,कण्ठस्थ करते हैं तो,उनकी बुद्धि में, सांसारिक अन्य किसी विषय का चिन्तन नहीं होता है।*

जिस काल में,वेदों के अध्ययन का विधान है,उसी काल में,वेदों का उच्चारण करने के लिए, ब्रह्ममुहुर्त में,उठकर,शौच,स्नान, शुद्ध वस्त्र धारण करके, ध्यानपूर्वक बुद्धि में स्मरण शक्ति के बलपर, निरन्तर ही वेद मंत्रों का उच्चारण करना,यह भी भगवान की भक्ति है।

*बुद्धि को नियमों में नियंत्रित करना,मन को नियमों में नियंत्रित करना,तथा शुद्ध, सात्विक भोजन आदि करना,ये सभी, वैदिकी भक्ति है।*

इन्द्र नवग्रह आदि देवताओं को,वैदिक विधि के अनुसार,विविध प्रकार के संयम करते हुए, देवताओं के सहित भगवान को प्रसन्न करना,वैदिकी भक्ति है।

*इसका तात्पर्य यह है कि- सांसारिक सुखों को त्यागकर,नियम संयम पूर्वक,एकमात्र भगवान का ध्यान करना,धारणा और ध्यान है।*

*ध्यान और धारणा,दोनों ही आध्यात्मिकी भक्ति है।*

*संयम नियम पूर्वक,गुरु की सेवा करते हुए,वेदों को शुद्ध उच्चारण के साथ साथ,उसके प्रयोगविधि को जानकर,उन मंत्रों का,सामग्री सहित उपयोग करना,भक्ति है।*

*अपनी अपनी शक्ति के अनुसार,भक्तगण, भगवान की भक्ति करके,भगवान के प्रिय हो जाते हैं।*

*इसका अभिप्राय यह है कि- तनसुखों का परित्याग करके,भगवान को उद्देश्य करके,आत्मप्राप्ति को उद्देश्य करके,किए जानेवाले आध्यात्मिक वैदिकी विधि को आत्मसात करना ही भगवान की भक्ति है।

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*ॐ नमः शिवाय*

अपनी पत्नी के विश्वासघात ने राजा भर्तृहरि को जगा दिया।

प्राचीन उज्जैन में बड़े प्रतापी राजा हुए राजा भर्तृहरि जिनके पास विशाल साम्राज्य था। उनकी पिंगला नाम की अत्यंत रूपवती रानी थी। राजा को रानी के ऊपर अटूट विश्वास एवं प्रेम था परंतु वह रानी राजा के बदले एक अश्वपाल से प्रेम करती थी और वह अश्वपाल भी रानी के बदले राजनर्तकी को चाहता था। वह राजनर्तकी अश्वपाल की जगह राजा भर्तृहरि को स्नेह करती थी।

उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भर्तृहरि ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।

राजा ने रानी के मृत्यु के वियोग के भय से उसे अमर बनाने के लिए वह फल खाने के लिए रानी को दिया। परंतु मोहवश रानी ने वह फल अश्वपाल को दे दिया। अश्वपाल ने वह राजनर्तकी को दे दिया। किन्तु राजनर्तकी ने जब वह फल राजा को दिया, तभी यह सारा सत्य बाहर आया। रानी की बेवफाई को देखकर राजा के पैरों तले की जमीन खिसक गयी।

राजा भर्तृहरि ने बाद में अपने नीतिशतक में इस घटना के बारे में लिखा हैः

*यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता।*
*साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।*
*अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या।*
*धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च।।*

'मैं जिसका सतत चिंतन करता हूँ वह (पिंगला) मेरे प्रति उदासीन है। वह (पिंगला) भी जिसको चाहती है वह (अश्वपाल) तो कोई दूसरी ही स्त्री (राजनर्तकी) में आसक्त है। वह (राजनर्तकी) मेरे प्रति स्नेहभाव रखती है। उस (पिंगला) को धिक्कार है ! उस अश्वपाल को धिक्कार है ! उस (राजनर्तकी) को धिक्कार है ! उस कामदेव को धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है !'

उनके अंतरचक्षु खुल गये। उन्होंने रनिवास, सिंहासन और राजपाट सब छोड़कर विवेकरूपी कटार से तृष्णा एवं राग की बेल को एक ही झटके में काट दिया। फिर जंगलों में भटकते-भटकते भर्तृहरि ने गुरु गोरखनाथ के चरणों में निवेदन कियाः

"हे नाथ ! मैंने सोने की थाली में भोजन करके देख लिया और चाँदी के रथ में घूमकर भी देख लिया। यह सब करने में मैंने अपनी आयुष्य को बरबाद कर दिया। अब मैं यह अच्छी तरह जान चुका हूँ कि ये भोग तो बल, तेज, तंदरुस्ती और आयुष्य का नाश कर डालते हैं। मनुष्य की वास्तविक उन्नति भोग-पूर्ति में नहीं वरन् योग में है। इसलिए आप मुझ पर प्रसन्न होकर योगदीक्षा देने की कृपा करिये।"

राजा भर्तृहरि की उत्कट इच्छा एवं वैराग्य को देखकर गोरखनाथ ने उन्हें दीक्षा दी एवं तीर्थाटन की आज्ञा दी।
तीर्थाटन करते-करते, साधना करते-करते भर्तृहरि ने आत्मानुभव पा लिया। उसके बाद कलम उठाकर उन्होंने सौ-सौ श्लोक की तीन छोटी-छोटी पुस्तकें लिखीं-

*वैराग्यशतक, नीतिशतक एवं शृंगारशतक।*

ये आज विश्व-साहित्य के अनमोल रत्न हैं।

इस प्रकार जिसके पूर्वजन्मों के संस्कार अथवा पुण्य जगे हों तब कोई वचन, कथा अथवा घटना उसके हृदय को छू जाती है और उसके जीवन में विवेक-वैराग्य जाग उठता है, उसके जीवन में महान् परिवर्तन आ जाता है

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*ॐ नमः शिवाय*

*!!लक्ष्य!!*

*मार्ग से भटकाने वाले लोगों पर ध्यान न देकर अपने निर्धारित लक्ष्य की और बढ़ें।*

एक बार स्वामी विवेकानंद रेल से कहीं जा रहे थे। वह जिस डिब्बे में सफर कर रहे थे, उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे। उन अंग्रेजों को साधुओं से बहुत चिढ़ थी। वे साधुओं की भर-पेट निंदा कर रहे थे। साथ वाले साधु यात्री को भी गाली दे रहे थे। उनकी सोच थी कि चूँकि साधू अंग्रेजी नहीं जानते, इसलिए उन अंग्रेजों की बातों को नहीं समझ रहे होंगे। इसलिए उन अंग्रेजो ने आपसी बातचीत में साधुओं को कई बार भला-बुरा कहा। हालांकि उन दिनों की हकीकत भी थी कि अंग्रेजी जानने वाले साधु होते भी नहीं थे।

रास्ते में एक बड़ा स्टेशन आया। उस स्टेशन पर विवेकानंद के स्वागत में हजारों लोग उपस्थित थे, जिनमें विद्वान् एवं अधिकारी भी थे। यहाँ उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने के बाद अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर स्वामीजी अंग्रेजी में ही दे रहे थे। इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते देखकर उन अंग्रेज यात्रियों को सांप सूंघ गया, जो रेल में उनकी बुराई कर रहे थे।

अवसर मिलने पर वे विवेकानंद के पास आये और उनसे नम्रतापूर्वक पूछा– आपने हम लोगों की बात सुनी। आपने बुरा माना होगा ?

स्वामीजी ने सहज शालीनता से कहा– “मेरा मस्तिष्क अपने ही कार्यों में इतना अधिक व्यस्त था कि आप लोगों की बात सुनी भी पर उन पर ध्यान देने और उनका बुरा मानने का अवसर ही नहीं मिला।” स्वामीजी की यह जवाब सुनकर अंग्रेजों का सिर शर्म से झुक गया और उन्होंने चरणों में झुककर उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली।

*शिक्षा:—*

हमें अपने आसपास कुछ नकारात्मक लोग जरूर मिलेंगे। वे हमें हमारे लक्ष्य से भटकाने की कोशिश करेंगे। लेकिन हमें ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान न देकर सदैव अपने लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए।

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*ॐ नमः शिवाय*

*-सच्ची तथा सही साधक की सिद्धियाँ-*
कोई भी साधक अपने इष्ट के निरंतर नाम जप से यहीं अनुभूति का आभास करता है

१- शरीर में हल्कापन और मन में उत्साह होता है ।

२- शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगन्ध आने लगती है ।

३- त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है ।

४- तामसिक आहार-विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्त्विक दिशा में मन लगने लगता है ।

५- स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है ।

६- नेत्रों में तेज झलकने लगता है ।

७- किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है, तो उसके सम्बन्ध में बहुत-सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिभासित होती हैं, जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती हैं।

८- दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती ।

९ - भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्वाभास मिलने लगता है ।

१० - शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है।

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