बड़ी देर लगी आने में, महोतर्मा,
यूँ नज़रें चुरा कर भीगी जुल्फ़ें सँवार रही हो।
छू कर देखा तो थरथर काँप रही थी तुम,
लगता है किसी ग़ैरों से नज़रें मिलाकर आ रही हो।
हाथ थाम कर हमारा कुछ कहने लगी हो तुम,
बिन पूछे ही अपना हाल-ए-बयाँ सुनाए जा रही हो।
आग लगी भी नहीं थी दिल में मेरे!
और तुम यूँ ही, उसे बुझाए जा रही हो।