कमाई की परिभाषा
कमाई की कोई किताबों-सी परिभाषा नहीं,
यह तो जीवन की हर साँस में बसी कहानी है।
कहीं सिक्कों की खनक है, कहीं आँसुओं की सीख,
कहीं रिश्तों की गर्माहट, कहीं सम्मान की पहचान है।
धन अगर पेट भर दे तो कमाई समझो,
दुःख अगर सिखा दे तो भी वह कमाई ही ठहरी।
जो हार के बाद हिम्मत बन जाए भीतर,
वह तजुर्बा भी तो उम्र की सबसे बड़ी कमाई ही रही।
माँ की दुआ, पिता का साया, दोस्त की सच्ची मुस्कान,
ये वो दौलत हैं जिन्हें तिजोरियों में नहीं रखा जाता।
जो रिश्तों में विश्वास बोता है जीवन भर,
वही इंसान असली अमीर कहलाता है, यही तो कमाई कहलाती है।
सम्मान जो मिले चरित्र की खुशबू से,
वह नोटों से कभी खरीदा नहीं जाता।
जिसने खुद को गिरने से बचा लिया हर बार,
समझो उसने ज़िन्दगी बहुत महँगी कमाई कमाई है।
तो पूछो मत—कितना बैंक बैलेंस है तुम्हारा,
पूछो—तुमने कितना मनुष्य होना कमाया?
क्योंकि धन, तजुर्बा, रिश्ते और सम्मान—
ये सब मिलकर ही जीवन की असली कमाई बन पाया।
आर्यमौलिक