दिन औऱ रात के लोग
दिन के उजाले में अंधे हैं लोग,
रात के अँधेरे में सफ़र करते हैं लोग।
सूरज सामने, फिर भी राह न दिखे,
झूठे उजालों में सच से डरते हैं लोग।
आँखों पर बाँध रखे हैं फ़ायदे के पट्टे,
दिल को गिरवी रख बाज़ार करते हैं लोग।
शोर बहुत है, पर सुनता कोई नहीं,
ख़ामोशी बेच कर भाषण करते हैं लोग।
दीप जले हर घर में, फिर भी अंधियारा,
मन के कोनों में ख़ौफ़ भरते हैं लोग।
आईने टूटे हैं सच बोलने के डर से,
तस्वीरों में ख़ुद को बेहतर करते हैं लोग।
रात की आगोश में सपने जाग उठें,
दिन की धूप में उन्हें मारते हैं लोग।
नींद को ओढ़कर जागने का अभिनय,
जागते-जागते भी सोते हैं लोग।
कभी तो लौटेगी रौशनी भीतर भी,
कभी तो सच का सामना करेंगे लोग।
तब दिन भी बोल उठेगा रात की भाषा,
और अँधेरों में भी उजाले भरेंगे लोग।
आर्यमौलिक