"बीज"
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हम सोचते हैं
समस्या कहीं बाहर से आती है—
किसी दूसरे की गलती,
किसी और समय की मार,
किसी अनजानी हवा की दिशा से।
पर सच यह है
कि सबसे घातक समस्याएँ
हम स्वयं बोते हैं
अपनी ही अनदेखी भूमि में,
जहाँ मन थोड़ा भी खाली पड़ा मिले
वहाँ डर
आकर ठहर जाता है।
डर—
एक छोटा-सा बीज,
पर इतना चालाक
कि मिट्टी को पता भी नहीं चलता
कब उसने उसे
अपनी गरमाहट दे दी।
फिर वही बीज
रात के अँधेरे में
हमारी छाती की गुफाओं में
धीरे-धीरे धड़कनें चूसते हुए
जड़ें फैलाता है।
पहले नरम,
फिर सख़्त,
फिर पत्थर-सी बेलें
हमारे पूरे भीतर की मिट्टी
अपनी पकड़ में ले लेती हैं।
हम कोशिश करते हैं
उन्हें उखाड़ फेंकने की—
पर हर जड़ के सिरे पर
हमारी ही किसी भूली हुई
कंपकंपी की छाप मिलती है;
हर पत्ती पर
हमारी ही किसी पुरानी
बेआवाज़ घबराहट की गंध।
और तब समझ आता है,
समस्या कभी बाहर की नहीं थी।
वह तो वही बीज था—
जिसे हम ही
अपने भीतर फेंककर भूल गए थे।
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