६……"घबराना नहीं"
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तुम आना, जैसे खिल उठी हो पानी की हर बूँद,
जिस तरह रात खोई है कहीं,
अंधेरों में गुम,
शोर में छुपी हुई,
तुम ढूँढना उस रात को
कड़कती बिजलियों में।
घबराना नहीं,
घबराना नहीं,
घबराना नहीं…
बादल बरसे अपनी गुर्राहट में,
पीली बिजलियों को कह देना —
“ले जाओ तस्वीर तुम्हारी भी।”
तस्वीर में तुम,
तस्वीर में तुम…
घबराना नहीं।
कुछ कदम चलना,
चलना,
कुछ और कदम…
तुम आना, जैसे खिल उठी हो पानी की बूँदें,
रास्ता खुद बना लेगी
कड़कती बिजलियाँ,
जिस तरह रात खोई है कहीं,
खोई है कहीं…
तुम ढूँढना उस रात को।
मेरी यादों में,
तुम्हारी यादों में,
वह बरसात की रात,
जिसमें हर बूंद में तेरा नाम था,
हर बिजली में तेरा ही चेहरा।
तुम घबराना नहीं।
तुम घबराना नहीं।
तुम आना,
जैसे खिल उठी हो पानी की हर बूँद,
और मैं वहाँ रहूँ
तुम्हारी हर छाया में,
तुम्हारी हर साँस में।
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