चलो आज फिर से अजनबी हो जाएं,
दिल के मौसम को खामोश मोड़ दे जाएं।
जो कहना था, कह चुके हैं हम,
अब चुप्पियों को ही राज़दां बनाए जाएं।
ना शिकवा रहे, ना कोई सवाल हो,
जो गुज़रा है, उसे बस ख़्वाबों में डाल दें।
मिटती नहीं जो दूरियाँ दिलों की,
तो क्यों ना फ़ासलों को ही मंज़िल मान लें।
दफन कर दें हर अल्फ़ाज़ इस मोड़ पर,
ताकि फिर कभी न लौटे कोई कसक उधर।
बस यूँ समझो, कहानी अधूरी सही,
मगर सुकून की एक आख़िरी पंक्ति लिख दी हमने।