"अंधेरे में लिखी रोशनी”
खुद को कैद कर लिया है मैंने, एक दरवाज़े के पीछे।
एक अरसे से मैंने अपने कमरे की खिड़कियां नहीं खोली हैं —
क्योंकि मुझे डर है कि बाहर का शोर अंदर न चला आए,
और भंग न कर दे मेरे भीतर के सन्नाटे को,
जिसे मैं हर घड़ी और गहरा करने की कोशिश में लगी हूँ।
अब ये सन्नाटा और ये तन्हाई मेरी ताक़त बन गए हैं।
आधी रात का वक़्त बेहद पसंद है मुझे,
क्योंकि उस वक़्त मैं खुद में खो जाती हूँ,
और तलाशती हूँ खुद को।
समय बिताती हूँ अपनी काग़ज़ और कलम के साथ।
एक सुकून मिलता है जब मैं कलम को
अपने जज़्बातों की स्याही में डुबोकर
पन्नों पर उतारती हूँ।
ऐसा लगता है मानो बरसों से दिल पर रखा बोझ
मैंने इन पन्नों पर रख दिया हो।
जैसे अंधेरे में डूबते किसी शख़्स को
मिल जाती है उम्मीद की एक किरन —
ठीक वैसे ही ये काग़ज़ और कलम
मेरी इस अंधेरी दुनिया का सहारा बन चुके हैं।
और सच तो यही है –
अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो,
बस ज़रा-सी रोशनी ही काफ़ी होती है
उसे मिटाने के लिए।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️