आत्म–सम्मान की मौत!
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कहा जाता है कि मनुष्य की आत्मा को कोई मार नहीं सकता। परंतु यह आधा सत्य है। आत्मा के भीतर एक और आत्मा होती है — आत्म–सम्मान। जब वही मर जाता है, तो जीवित शरीर भी केवल एक चलता–फिरता शव बन जाता है।
आत्म–सम्मान की मृत्यु किसी तलवार के प्रहार से नहीं होती। वह तो चुप्पियों के साये में, धीरे–धीरे दम तोड़ता है। एक दिन अचानक पता चलता है कि नजरें मिलाने का साहस खो चुका है, शब्द कंठ से नहीं फूटते, और भीतर का आईना बिखर चुका है। टूटे आईने में चेहरा धुँधला पड़ जाता है — जैसे अस्तित्व ने खुद अपने को पहचानने से इनकार कर दिया हो।
कभी–कभी लगता है आत्म–सम्मान की मौत वही क्षण है जब आदमी भीड़ के शोर में खुद को गुम कर देता है। भीड़ हाथ उठाती है, वह भी उठाता है। भीड़ सिर झुकाती है, वह भी झुकाता है। भीड़ चुप रहती है, वह भी चुप रहता है। पर भीतर एक हल्की सी तड़प बनी रहती है — जैसे मृत शरीर की आँखें अभी पूरी तरह बंद न हुई हों।
मृत आत्म–सम्मान भी कभी–कभी सपने में लौट आता है। वह हमें झकझोरता है, पूछता है — “क्या यही जीवन है? बिना रीढ़ का, बिना स्वर का, बिना प्रकाश का?” उस क्षण मन काँपता है, पर मनुष्य इतना अभ्यस्त हो चुका होता है समझौते का कि वह तड़प को भी गहरी नींद का हिस्सा मान लेता है।
फिर भी, सत्य यह है कि आत्म–सम्मान सचमुच मरता नहीं, वह केवल समाधि लेता है। राख के नीचे छुपी चिनगारी की तरह। बस कोई हवा चाहिए, कोई स्वर चाहिए, कोई ऐसा साहस चाहिए जो भीड़ से नहीं, भीतर से निकले। तब वह मृतप्राय आत्मा फिर जीवित हो सकती है, और उसका प्रकाश धूल में बिखरे सम्मान को फिर से आकाश की ओर उठा सकता है।
इसलिए आत्म–सम्मान की मौत एक अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह हमें बताती है कि यदि तुम चुप रहोगे, तो तुम्हारा अस्तित्व भी केवल परछाईं बनकर रह जाएगा। और यदि तुम उठ खड़े होगे — चाहे अकेले ही क्यों न हो — तो वही परछाईं दीपक बन जाएगी।
आर के भोपाल