आरक्षण! समानता का सपना या पिछड़ेपन का जाल!
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लोकतंत्र आखिर है क्या? संख्याओं का खेल।
जिस जाति की जनसंख्या अधिक है, वही राजनीतिक रूप से ताक़तवर है। वोट बैंक का आकार ही राजनीतिक दलों की असली मुद्रा है।
पचहत्तर वर्षों की यात्रा में हमने किसी भी "पिछड़े" जातिए समूहों को "सामान्य" बनाने की दिशा में कोई काम नहीं किया, हाँ, कई "अगड़े" जातिये समूहों को "पिछड़ा" ज़रूर बना दिया। उदाहरण सामने हैं—राजस्थान की गुर्जर, हरियाणा की जाट और महाराष्ट्र की मराठा जातियाँ। सभी अपने-अपने समय पर सड़कों पर उतरीं और आरक्षण के नाम पर सरकारों को झुकने पर मजबूर किया।
आरक्षण, जो कभी शोषित और वंचित समाज की ढाल था, आज राजनीति की सबसे धारदार तलवार बन चुका है।
किसी भी जाति के पास अगर दस-पंद्रह प्रतिशत वोट हैं, तो वह सत्ता के दलालों के लिए "गोल्डन चिप" है। राजनीतिक दल इसे सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि चुनावी सौदेबाज़ी का औजार मान चुके हैं। भाजपा भी इसमें अपवाद नहीं है—गुर्जरों को साधने के लिए राजस्थान में, पटेल आंदोलन को शांत करने के लिए गुजरात में वही खेल खेला गया।
सामान्य वर्ग आज लोकतंत्र का "एकलव्य" है। जैसे द्रोणाचार्य ने उसका अंगूठा मांगकर उसे युद्ध से बाहर कर दिया था, वैसे ही राजनीतिक दल सामान्य वर्ग को चुनावी गणित से बाहर कर चुके हैं। मोदी सरकार ने ईडब्ल्यूएस (10% आरक्षण) देकर इस वर्ग को थोड़ी राहत दी, मगर यह मरहम स्थायी इलाज नहीं है।
भविष्य और पेचीदा दिखता है। ओबीसी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा भी इसी वर्ग में आता है। आगे चलकर ओबीसी की जातियाँ एससी और एसटी में शामिल होने की मांग करेंगी। उदाहरण—कर्नाटक की कुछ पिछड़ी मुस्लिम जातियाँ और उत्तर प्रदेश की निषाद, मल्लाह जैसी जातियाँ पहले से ही एससी का दर्जा मांग रही हैं।
विडंबना यह है कि ओबीसी की कई छोटी जातियों की हालत वास्तव में दलितों से भी अधिक दयनीय है, मगर उनकी जनसंख्या कम होने के कारण कोई उनकी ओर देखता तक नहीं। राजनीति में केवल वही जाति मायने रखती है, जिसकी संख्या सत्ता बदल सके।
इतिहास इस पूरी बहस का साक्षी है।
1950 में जब संविधान लागू हुआ तो डॉ. अंबेडकर ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए दस साल की अस्थायी व्यवस्था की कल्पना की थी, लेकिन यह अस्थायीता स्थायी हो गई।
1979 में जनता पार्टी सरकार ने मंडल आयोग गठित किया, जिसने 1980 में सिफ़ारिश की कि 27% आरक्षण ओबीसी को दिया जाए।
1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किया और पूरा देश सुलग उठा। सड़कों पर आत्मदाह हुए, आंदोलन भड़के, लेकिन आरक्षण स्थायी सच बन गया।
2006 में यूपीए सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू किया। उस समय भी देशव्यापी आंदोलन हुए।
इसके बाद से आरक्षण की राजनीति हर दशक में एक नए उफान पर पहुँचती रही है।
अब प्रश्न यही है—क्या आरक्षण अंततः 100% तक पहुँचेगा? रुझान यही कहता है,और जब किसी चीज की अति हो जाती है, तभी उसके अंत की भी शुरुआत होती है। आरक्षण के 100% हो जाने पर ही देश शायद इसके बोझ से मुक्ति की ओर बढ़ेगा।
लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी त्रासदी है,
जहां हमें जाति को समाप्त करना था, वहां हमने उसे और गहराई से गढ़ दिया।
आरक्षण की शुरुआत समानता के स्वप्न के साथ हुई थी, लेकिन आज पिछड़ेपन की जाल बनकर रह गई है।
आर के भोपाल