पुर्वजों के पाप का फल!
___________________________
बारह-तेरह बरस का अफ़ग़ानी बच्चा, हवाई जहाज़ के पहिये से लटक चिपक कर काबुल से दिल्ली में उतर आया।
उसे ना ठंड ने जमाया, ना ऊँचाई ने गिराया, ना आक्सीजन की कमी ने मारा।
वो मुस्कुराता हुआ बाहर निकल आया।
जैसे इतिहास खुद उसके पीछे उतर आया हो।
विशेषज्ञ हैरान हैं कि बच्चा ज़िंदा कैसे बच गया।
लेकिन असली हैरानी तो ये है कि वही अफ़ग़ान धरती, जिसके लुटेरे कभी उत्तर भारत को खून और राख में लपेट देते थे,
आज अपनी औलादों को भूख और बेबसी में बाहर फेंक रही है।
ग़ज़नी, गोरी, ऐबक, बहलोल,और सूरी,जिन्होंने यहाँ की दौलत और बेटियों को बाज़ारों में बेचा था।
अहमद शाह अब्दाली—जिसने मथुरा तक को लहूलुहान किया और सारा सोना-चाँदी लाद ले गया।
आज उनकी संतति उसी हिन्दुस्तान के दरवाज़े पर, टायर से लटककर, पनाह माँग रही है।
समय का पहिया यही है, पुर्वजों के पाप का फल संतति ऐसे ही भोगता है।
कल घोड़ों की टाप पर दौड़ती तलवारें थीं,
आज एयरबस के पहिये से चिपकी लाचारी है।
इतिहास हँसकर कह रहा है, अफगानियों के “बाबा-ए-क़ौम की तलवार से जो दरवाज़े टूटे थे,
उनकी औलाद अब उन्हीं दरवाज़ों पर रोटी की भीख माँग रही है।”
आर के भोपाल।