माँ-बाप का हिस्सा!
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जीवन की साँझ ढल रही थी। बरामदे में रखी पुरानी चौकी पर बूढ़ा पिता बैठा था। उनके सफेद बालों में वक्त की राख जमी हुई थी और आँखों में एक थक चुके सूरज की उदासी थी। पास बैठी माँ के होंठों पर भले ही चुप्पी थी, लेकिन उनकी आँखों में हजारों बेचैनियों की भीड़ उमड़ रही थी।
यादें बार-बार मन के आँगन में दस्तक देतीं। वे बरसात की रातें, जब छत टपकती थी और पिता ने बच्चों को भीगने से बचाने के लिए खुद को आड़ बना लिया था। सर्दियों की वो स्याह सुबहें, जब माँ ठिठुरती उँगलियों से रोटियाँ सेंककर बच्चों की थाली सजाती थी। और वे दिन, जब भूख से जलते पेट के बावजूद बच्चों की फीस चुकाने के लिए माँ-बाप ने अपनी नींद, अपनी चाहतें, यहाँ तक कि अपनी जवानी तक बेच दी थी।
अब वही बच्चे, पढ़े-लिखे, और बड़े होशियार लोग बनकर घर में बैठे थे। घर की दीवारें ऊँची थीं, पर रिश्तों की नींव में दरार पड़ चुकी थी। बहुएँ छोटी-छोटी बातों पर कलह करतीं, और वह कलह अब पिता और मां की आत्मा को कचोटने लगी थी।
पिता ने सोचा, "संपत्ति बाँट दूँ। शायद बँटवारे से झगड़े मिट जाएँ।" और उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई—खेत, बाग़, मकान, सब कुछ—तीनों बेटों और इकलौती बेटी में बराबरी से बाँट दिया।
लेकिन जैसे ही सवाल उठा, "माँ-बाप किसके पास रहेंगे?" घर की दीवारों पर खामोशी छा गई।
बड़ा बेटा बोला, "पिताजी, आप और माँ तीन-तीन महीने हमारे पास रह लीजिए। साल पूरा हो जाएगा, और किसी पर बोझ भी नहीं पड़ेगा।"
यह सुनते ही पिता का हृदय भीतर से चकनाचूर हो गया।
उन्होंने सोचा, "क्या मैं सचमुच बोझ हूँ? क्या इन दीवारों और इन बच्चों के बीच मेरे लिए अब कोई जगह नहीं बची?"
माँ की आँखें नम थीं। उसकी चुप्पी चीख से ज्यादा तीव्र लग रही थी।
पिता ने गहरी साँस भरकर कहा, "ये सम्पत्ति मेरी कमाई है,और अब अंत तक मेरे पास ही रहेगी। अपनी देखभाल के लिए मैं नर्स रख लूँगा। हाँ, पर तुम चारों मेरे साथ बारी-बारी से तीन-तीन महीने रह सकते हो। बाक़ी समय की व्यवस्था खुद कर लो।"
कमरा सन्नाटे से भर गया। बेटों की गर्दनें झुक गईं, और बहुएँ ज़मीन पर निगाहें गड़ाए खड़ी रह गई।
आर के झा भोपाल।