“हिकायत-ए-मोहब्बत”
इतना भी आसाँ नहीं मुझे फिर से उल्फ़त हो जाना,
ऐ ख़ुदा ये ख़ता होने से पहले मेरी हलाकत हो जाना।
जिसे दिल कह कर सँवारा था कभी हर धड़कन में,
अब उसी ज़िक्र से ख़ौफ़ खाना मेरी आदत हो जाना।
मोहब्बत की हिकायत भी लबों पे आने से कतराए,
कहीं फिर से वो अधूरी दुआ न हसरत हो जाना।
अब तो एहसास भी दिल को दर्द सा देने लगा है,
इसलिए हर जज़्बा भी मुझसे बग़ावत हो जाना।
तेरे नाम से वाबस्ता है मेरी हर दुआ, "कीर्ति",
वरना मेरी हर बद्दुआ का भी रहमत हो जाना।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
उल्फ़त = मोहब्बत, प्यार
हलाकत = मौत, मृत्यु
हिकायत = कहानी, दास्तान
वाबस्ता = जुड़ा हुआ, सम्बन्धित
रहमत = दया, कृपा, रहम