वर्तमान सभ्यता और संस्कृति की अभ्युदय गंगा के मैदानों से ही हुई होगी!!
इसीलिए,
गंगा-तट की स्मृति मन में जागते ही हृदय में एक अद्भुत रसधारा बह निकलती है। भोर की स्वर्णाभा जब जलतरंगों पर प्रतिबिंबित होती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात् आदित्यदेव स्वर्ण-कमल पर आरूढ़ होकर जगत् के सम्मुख आशीष-वर्षा कर रहे हों। घाट की सीढ़ियाँ केवल शिलाखंड नहीं, वे अनादि युगों की साधना-सोपान हैं, जहाँ ऋषि-हृदय की मौन प्रार्थनाएँ और जन-जन की आर्त पुकारें अभी भी प्रतिध्वनित होती हैं।
जब नन्हें दीप जलधारा पर तैरते हैं, तो वे केवल मिट्टी-दीपक नहीं रहते, अपितु मनुष्यता के म्लान स्वप्नों को नव-दीप्ति प्रदान करने वाले दैवी संदेशवाहक बन जाते हैं। आरती की गूंज और घंटनाद की अनुगूंज मानो स्वर्गिक वीणा के स्वर हैं, जो आत्मा के अंतःकरण को शुद्ध करके ब्रह्मानंद में विलीन कर देते हैं।
गंगा स्वयं केवल नदी नहीं, वह ‘मुक्तिधारा’ है, वह संस्कृति का साक्षात् प्रवाह है—अनवरत, अनश्वर, अमर। वहाँ लौटना मानो अपने उद्गम में लौटना है, अपने मूल स्रोत से पुनः एकाकार होना है। इसीलिए हृदय पुकार उठता है—
“यदि संभव हो तो लौट आना, पुनः उसी गंगा-तट पर, जहाँ समय ठहरता है और आत्मा अमृतरस पाती है।”
आर के झा भोपाल।