"समय स्थिर नहीं रहता, यह बदलेगा, यही सूक्ष्म और शाश्वत नियम है" — यही तो सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है।
✧ प्रस्तावना ✧
(सूत्रात्मक ग्रंथ के लिए)
मनुष्य ने ईश्वर को समझा नहीं —
बल्कि उसे सत्ता, संस्था और व्यक्ति का रूप दे दिया।
जो सत्ता के अनुकूल दिखा, वही “ईश्वर” कहलाया।
जो विरोध में खड़ा हुआ, उसे “अधर्मी” कहा गया।
परंतु सत्य यह है —
ईश्वर न किसी पंथ का है,
न किसी शास्त्र का है,
न किसी संस्था का।
ईश्वर तो श्वास की तरह है,
धड़कन की तरह है,
कण–कण में, कंकड़–कंकड़ में।
वह अच्छा–बुरा नहीं,
पुण्य–पाप नहीं,
बल्कि संपूर्ण लीला है।
मानव ने जितना समर्पण किया,
उतना ही ईश्वर को समझा।
पर जहाँ बुद्धि अटक गई,
वहाँ उसने ईश्वर को तोड़कर
एक धर्म, एक संप्रदाय,
एक संस्था बना दिया।
यही सबसे बड़ा झूठ है —
कि “हमारे पास ईश्वर है।”
सच यह है —
किसी के पास ईश्वर नहीं,
क्योंकि ईश्वर सबका और सबमें है।
समय साक्षी है —
कोई संस्था, कोई सत्ता
सदा स्थिर नहीं रह सकती।
जो आज बलवान है, कल मिटेगा।
पर जो शाश्वत है, वही बचेगा —
और वही ईश्वर है।
✍🏻 — 𝓐𝓰𝔂𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲