"तू मतला, मैं मुक़म्मल"
तू मतला लिखेगा मैं आगे के शेर लिखूँगी,
उसमे अपनी ज़फर और तुझे ज़ेर लिखूँगी।
ग़फ़लत में मत रहना की मैं डर गई तुझसे,
इंतज़ार कर अब नहीं तो देर सवेर लिखूँगी।
अपने एक-एक आँसू का हिसाब लूंगी तुझसे,
बिन आँसू बहाए आँखों से ज़हर लिखूँगी।
शायरा हूँ तो बेइज़्ज़त भी तमीज़ से करूंगी,
इब्रत है तुझे गीदड़, खुद को दिलेर लिखूँगी।
तू धनवान है दौलत से पर दिल का फ़क़ीर है,
मैं फ़क़ीर हूँ पर दिल को अपने कुबेर लिखूँगी।
तक्सीर तेरी जो दाग़ लगाए "कीर्ति" की इफ्क़त पर,
तुझे वज़ह, और खुद को राख़ का ढेर लिखूँगी।
Kirti Kashyap "एक शायरा"✍️
ज़फर = जीत
ज़ेर = हार
ग़फ़लत = बेपरवाही
इब्रत = चेतावनी
तक्सीर = भूल, अपराध
इफ्क़त = पवित्रता