Hindi Quote in Book-Review by Biru Rajkumar

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भाग 3: प्रेम बंधन – अंजाना सा

रीना के दिन रसोई और सिलाई-बुनाई में ही गुजरते थे। कभी वो नई डिश बनाना सीखती, तो कभी खुद से गाउन डिज़ाइन करती। वो हमेशा खुद को किसी न किसी काम में व्यस्त रखती। उसका मानना था कि जो कुछ भी वो सीख रही है, शायद एक दिन काम आए।

उधर उसके माता-पिता रिश्तेदारों से लड़के देखने की बात कहते रहते थे। इसी तरह चार महीने बीत गए। एक दिन किसी रिश्तेदार का फ़ोन आया—उन्होंने एक लड़का देखा था, और अगले ही दिन वो लड़के वाले रीना को देखने आने वाले थे।

लड़के वालों ने आकर रीना को देखा और उसे पसंद भी कर लिया। रीना के माता-पिता बहुत खुश थे, लेकिन रीना के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। वो मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि कोई चमत्कार हो जाए, कोई उसे इस शादी से बचा ले।

बिना रीना की भावनाओं को समझे, माता-पिता ने रिश्ता पक्का कर दिया और शादी की तारीख़ भी तय हो गई।

शादी से कुछ हफ्ते पहले रीना की फैमिली ने शिमला जाने की योजना बनाई—थोड़ी राहत, थोड़ा सुकून पाने के लिए। रीना भी उनके साथ चली गई।

शिमला की वादियों में एक अजीब-सा सुकून था। रीना को वहां की ठंडी हवा, हरियाली, और पहाड़ों का नज़ारा बहुत अच्छा लगा। परिवार के सभी लोग साथ मिलकर घूमने-फिरने और मंदिरों के दर्शन की योजना में व्यस्त थे।

सबके साथ घूमते-घूमते रीना अनजाने में काफ़ी दूर निकल गई। वो एक ऊँचे टीले के पास आकर बैठ गई। वहाँ बैठ कर वो चारों ओर फैली हरियाली को देखने लगी, ठंडी हवा उसके बालों से खेल रही थी और मन किसी अनकहे एहसास से भर गया था। उसे पहली बार महसूस हुआ जैसे प्रकृति उसके मन की बात सुन रही हो।

वो बस एक ही सवाल अपने आप से पूछ रही थी –
"क्या यही मेरी मंज़िल है, या अभी कुछ बाकी है?"


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Hindi Book-Review by Biru Rajkumar : 111987427
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