---
प्रेम क्या है?
प्रेम कोई शब्द नहीं,
न कोई वादा, न सौगंध,
ये तो वो मौन भाषा है
जो आत्मा से आत्मा तक पहुँचे अनंत।
दावे बहुत करते हैं लोग,
“मैं प्रेम करता हूँ”, “मुझसे प्रेम करो” –
पर क्या वास्तव में जानते हैं
प्रेम क्या होता है, इसका असली स्वरूप क्या है?
प्रेम वो नहीं जो सिर्फ तन की चाह में बंधा हो,
न वो जो सिर्फ नाम, रूप, या रिश्तों में फँसा हो।
प्रेम तो है —
निस्वार्थ, निर्विकार, निर्बंध एक बहती धारा।
वो जहाँ
न स्त्री न पुरुष का भेद रहे,
न अधिकार, न अपेक्षा,
सिर्फ साथ हो, समझ हो, और मौन सहमति।
जहाँ तुम मुझसे अलग न लगो,
और मैं तुममें विलीन हो जाऊँ,
जहाँ न कोई बंधन हो, न कोई डर,
वही तो प्रेम है – खुला, विशाल, विस्तृत गगन।
प्रेम है –
साँझ के धूप में बैठी दो आत्माएँ,
जो कहती नहीं कुछ, पर जानती हैं सब।
एक दूसरे की आँखों में खुद को देख पाना
और कह पाना – “मैं हूं, तू है, और यही काफ़ी है।”
प्रेम,
कभी छांव बन कर साथ चलता है,
तो कभी मौन में भी बाँध लेता है।
ये कोई सौदा नहीं,
ये समर्पण है – खुद को किसी के लिए खो देने का सुख।
सिर्फ पलभर का एहसास भी
जब जीवन भर का विश्वास बन जाए,
वहीं से शुरू होता है — सच्चा प्रेम।
---
क्या यही प्रेम नहीं जिसकी खोज हम सब करते हैं?
जिसे पाने की लालसा में दुनिया भर के मोड़ घूम आते हैं,
पर जो बस तब मिलता है,
जब हम 'स्व' को भुला दें और 'हम' को जी लें।
---