दो जून की रोटी प्रभु जी, सबको ही मिल जाए।
पतली मोटी या छोटी हो, सबको यह मिल जाए।
दो जून की रोटी भी बड़ी किस्मत से मिलती है।
दिन–रात जूझते हैं बंदे तब कहीं यह मिलती है।
दो जून की रोटी के लिए कठिन कर्म कमाते हैं।
कर्तव्यों की दहलीज़ पे जान की बाजी लगाते हैं।
दो जून की रोटी का जुनून भी इश्क से बेहतर है।
बेवजह मुस्कराहट में सुकूं तो अश्क से बेहतर है।
दो जून की रोटी का दर्द समझती नहीं है दुनिया।
रोटी के निवाले का मर्म समझती कहां है दुनिया।
दो जून रोटी के लिए दिन रात भटकता है बंदा।
अपनों को पोषण के लिए कहां रुकता है बंदा।
दो जून रोटी के लिए कई श्रम दान करने होते हैं।
जिम्मेदारी निभाने हेतु कई बलिदान देने होते हैं।