Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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हास्य व्यंग्य
यमलोक वाचस्पति सम्मान

अभी-अभी मित्र यमराज घर आ गये,
यमलोक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय
और सर्व शोध संस्थान
बनाने का प्रस्ताव लेकर अड़ गये।
मैं झुंझलाया- ये कौन सा खुराफात तेरे मन में आया।
यमराज हाथ जोड़कर बोला -
बस! प्रभु - आप चुपचाप रहिए
जो कहता हूँ, मौन रहकर सुनिए,
मेरी पीड़ा को भी तनिक महसूस कीजिए,
या फिर मुझे और मेरे चेलों को भी
विद्या वाचस्पति दिलवा दीजिए।
यमराज की बात सुनकर मैं चकरा गया
आज इसने मुझे कहाँ फँसा दिया?
मैंने प्यार से समझाया -
भला मैं तुम सबको
विद्या वाचस्पति कैसे दिलवा सकता हूँ?
जब मैं किसी संस्था, शोध संस्थान या विश्वविद्यालय का
कुलाधिपति, कुलपति या कुलसचिव भी नहीं हूँ,
न ही मेरा कोई इष्ट मित्र ही इस लायक है
जो मेरी सिफारिश पर तेरे मन की मुराद पूरी करवा दे।
और जो हैं भी वो सब लूट लेना चाहते हैं
विद्या वाचस्पति, विद्या सागर की आड़ में
अपना घर भर लेना चाहते हैं,
सच कहूँ! तो सिर्फ अपनी दुकान चलाता चाहते हैं।
यमराज ने बीच में मुझे रोक कर कहा -
प्रभु जी! आप नाहक हैरान, परेशान न हो रहे हो
मेरी बात पर फिर भी नहीं विचार कर रहे हो,
बस! आप मुझे अपनी स्वीकृति भर दीजिए
मेरी संस्था का कुलाधिपति बनना सहर्ष स्वीकार कीजिए,
कुलपति तो मैं हो ही जाऊँगा,
कुलसचिव आप अपने हिसाब से
जिसको चाहें मनोनीत कर दीजिए
अच्छा होगा भौजाई को ये उपहार में दे दीजिए।
विश्वास कीजिए एक साल में इतिहास बन जाएगा
धरती से यमलोक तक हर कोई
वाचस्पति वाला डाक्टर हो जाएगा,
सबके हाथ में यमलोक वाचस्पति सम्मान
जब आपकी अपनी संस्था की ओर से
मुफ्त में बाँटा जाएगा।
मैं हक्का बक्का रह गया
यमराज ये क्या कह गया?
यमराज अपनी रौ में कहता रहा
दुनिया जानती है, मैं आपका मित्र हूँ,
फिर भी मुझे विद्या वाचस्पति अब तक नहीं मिला,
फिर भी आप चाहते हैं मैं न करुँ कोई गिला।
वैसे भी मैं आपका सम्मान करता हूँ,
इसीलिए इतने प्यार से तो अनुरोध करता हूँ,
आप मेरे प्रस्ताव अस्वीकार कीजिए
फिर देखिए! मैं सबकी दुकान बंद करवा दूँगा
जिंदा हो या मुर्दा, हर किसी के नाम
यमलोक वाचस्पति सम्मान मुफ्त जारी करवा दूँगा,
आपकी अपनी संस्था का नाम ब्रह्मांड विश्व रिकार्ड में
दर्ज कराकर ही वापस यमलोक वापस जाऊँगा।
वैसे भी आपको कुछ नहीं करना है
सब कुछ मैं कर लूँगा,
आपका हस्ताक्षर भी मैं ही कर लूँगा
बस! अपना सपना पूरा करने के लिए
इसके लिए सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहूँगा,
अपने चेले चपाटों को भी यमलोक वाचस्पति देकर
डाक्टर लिखना सिखाऊँगा,
जब मैं स्वनिर्मित विश्वविद्यालय का कुलपति हो जाऊँगा,
आपको हमेशा ही सिर पर बिठाकर घुमाऊँगा।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 111978411
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