वो मेरा था… सिर्फ मेरे ख्वाबों में,
असलियत में तो शायद… किसी और का था।
मैं रोज़ उसे चाहती रही,
वो रोज़ किसी और में खोया रहा।
मैंने हर शाम उसकी यादों को लिखा,
और वो शायद किसी और को Goodnight कहता रहा।
मैंने हर बार खुद से कहा —
"शायद कल वो मुझे भी देखेगा…
शायद कल वो मुझे भी समझेगा…"
पर हर ‘शायद’ सिर्फ मेरा था,
उसके लिए… मैं शायद कभी भी नहीं थी।