।। ऐसा हो एक सवेरा ।।
ये राग मेरी, ये गीत मेरा ,
अब ना किसी बंधन का है मुझ पर घेरा,
मैं जो चाहूं वह लिखूं,
मैं जो चाहूं वह गुनगुनाऊं,
अब मेरा चित ही मेरा रैन बसेरा।।
कायदों से थोड़ा दूर है रुख मेरा,
लय ताल का मैं ना जानता ये फेरा,
मैं तो चाहूं हर जगह लय हो,
उन्माद - अवसाद सब को तर जाऊं,
ऐसा हो एक सवेरा
ऐसा हो एक सवेरा।।
- अदम्य -