प्रकृति का आर्तनाद
सूखी पत्तियाँ कहती हैं,
“कहाँ गई वो ताजगी?
जिस धरती पर हरियाली थी,
अब क्यों बस राख पड़ी?”
हवा जो गीत गाती थी,
आज घुटन में रो रही,
पंछी जो उड़ते थे निर्भय,
अब घोंसले छोड़ भाग रहे।
नदियाँ, जो बहती थीं स्वच्छ,
जैसे माँ की ममता का प्रवाह,
अब कचरे में दबकर सिसकती हैं,
और खो बैठी अपना प्रवाह।
पेड़ जो छाँव देते थे,
अब कुचले जाते हैं कुल्हाड़ियों से,
जड़ें रोती हैं गहराई में,
और आसमान होता है खाली।
धरती का दिल है घायल,
उसकी नसों में जहर है घुला,
हमारी इच्छाओं की आग ने,
उसका हर सपना जला दिया।
क्या हम अब भी जागेंगे नहीं?
क्या यह विनाश यहीं थमेगा नहीं?
अगर प्रकृति थक गई तो सुन लो,
हमारा अस्तित्व भी बचेगा नहीं।
आओ फिर से संकल्प करें,
हर पेड़ को एक साथी मानें,
धरती की हर सांस बचाएं,
हर नदी को पवित्र बनाएं।
पर्यावरण को पुकारने दो,
वह हमारी जीवनरेखा है,
अगर उसे बचा सको,
तो सच्चा इंसान यही है।
lokesh dangi.........