Hindi Quote in Book-Review by Kishore Sharma Saraswat

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उपन्यास : जीवन एक संघर्ष
उपन्यासकार : किशोर शर्मा 'सारस्वत'
कुल भाग : 42, कुल पृष्ठ : 940
आज समीक्षा : भाग 6 की

कथानक : महेश्वर प्रसाद जी ने बेटी कविता को चंडीगढ़ की जानी-मानी न्यू नाॅलेज एकेडमी में प्रवेश दिला दिया व शिमला लौट आए। तब कविता ने स्वयं को चंडीगढ़ में अपनी बुआ के पास रह कर सिविल सेवा की तैयारी में डुबो दिया।
इधर जगपाल चौधरी का होनहार बेटा रमन भी चंडीगढ़ में रह कर अपने चहेते मसीहा गुरू प्रोफेसर अमलेंदू घोष के सान्निध्य में सिविल परीक्षा की तैयारी कर रहा था जो उसकी बुद्धिमत्ता के कायल थे।
रमन अपने भोले भाले परिश्रमी पिता के साथ ग्राम छली प्रधान द्वारा किए षड्यंत्र के कारण दु:खी था अत: वह अपने हितैषी गुरू प्रो. घोष से राय लेने के लिए गया जहाँ उन्होंने उसे इस दुविधा से निकलने के उपाय बताए। साथ ही अगले दिन भ्रष्टाचार, पुलिस और देश की राजनीति विषयक एक महत्वपूर्ण सेमीनार में आने का न्योता भी दिया। इस सेमीनार में प्रोफेसर घोष भी वक्ता थे। उन्होंने रमन को जीनियस छात्रा कविता एवं अन्य न्यू नाॅलेज एकेडमी से आए हुए विद्यार्थियों से भी मिलवाया। रमन की लंच के दौरान कविता से परस्पर परिचयात्मक वार्ता भी हुई।

सेमीनार में वक्ताओं का वृहद उद्बोधन पठनीय बन पड़ा है।
उपन्यासकार ने इस भाग में कविता व रमन की मुलाकात करवा कर इस वृहद उपन्यास के दो पात्रों की भविष्य में उनकी मुख्य भूमिका रहने के संकेत दे दिए हैं।
रमन की अपने चहेते प्रोफेसर घोष से हुई मुलाकात में उनकी रमन को सारगर्भित सलाह सूक्ति वाक्य बनकर सामने आई है जो द्रष्टव्य है:
- समझ लो तुम्हारे गाँव के लोग रेलगाड़ी की बोगीज़ हैं। उन्हें मूव करने के लिए एक इंजन चाहिए और कुछ नहीं। बुराई को फिनिश करने के लिए किसी एक को तो फ्रंट में आना होगा और यह काम कोई एजूकेटेड ही कर सकता है।
- गरीबी और अनपढ़ता आदमी को भेड़ बना कर रख देती है। एक हांकने वाला मिल गया, सब उसके साथ हो जाती हैं।
- तुम हँसोगे तो दुनिया तुम्हारे साथ हँसेगी, तुम रोओगे तो तुम्हें अकेले ही रोना पड़ेगा। दुनिया हमेशा स्ट्रांग आदमी का साथ देती है। कमजोर का साथ तो उसकी अपनी किस्मत भी नहीं देती।
- अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण की भाँति हमारे जीवन रथ का सारथी भी ईश्वर ही है। यदि हमने उसे न भुलाया, उस पर विश्वास रखा तो वह हमें शक्ति प्रदान करेगा।
- ईश्वर स्वयं संघर्ष नहीं करेगा, उसे जो कुछ करना है हमसे ही कराएगा।
- आत्मा अमर है, शरीर की हत्या करना आत्महत्या नहीं है, असली आत्महत्या तो सत्य से डिगना और न करने योग्य कर्मों के जाल में फंसना है।
- सत्य का पालन करते हुए अपने और दूसरों के जीवन की रक्षा करना ही धर्म है। (पृष्ठ 66-67)
- बुराई की जितनी भी भर्त्सना की जाए, उतनी थोड़ी है। मूक रहना अपने आप में एक स्वीकारोक्ति है। (पृष्ठ 70)
- रिश्वत लेने की आदत तभी पड़ती है, जब रिश्वत देने वाले होते हैं। (पृष्ठ 73)
- आज राजनीति, अपराध और भ्रष्टाचार तीनों ही एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं। तीनों को एक दूसरे के सहारे की जरूरत है। फिर भी भ्रष्टाचार इनमें शिरोमणि है। भ्रष्टाचार समाप्त हो जाए तो अपराध पर भी अंकुश लग जाएगा और राजनीति भी स्वच्छ हो जाएगी। (पृष्ठ 89)

यह भाग उपन्यास की नींव का पत्थर प्रतीत होता है

Hindi Book-Review by Kishore Sharma Saraswat : 111961202
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