आप कला कविता कंठ कर्म कर्मण्य की पहली कतार...
आप सदैव संकर्म सहज शांत बहती रहती सरिता का सार...
आप जलती हुई ज्वाला के भीतर शीतल जल का जैसे झनकार...
आप अविरत अणनम अनमोल अलौकिक असाधारण से अवतार...
आप हिम हरियाली हरित 'हर्ष' के हृदय को हरते रहते हीरो का हार...
आप नित्य निरंतर निर्मल नभ को स्पर्शते रहते 'नंदिनीय' नार...
~ Harshhh