साए में बसता हूँ तलब ए दिदार हर रात,
ख्वाब कब तेरा शबाब ढलता हूँ हर रात।
रात ए वस्ल है, पर ग़म ये मगर डर सहें,
सबा ए हयात रहे पर दर्द उ’म्र भर न रहे।
ख़ुश्बू में डूबा हुआ फयम ओ जका ये दिल,
तेरी आगोश में पाया जहाँ फक्त हासिल।
बुलन्दी प्यारी, मगर वक़्त के ये सिलसिले,
तिष्नगी आँगन में क्यूँ अब उ’म्र भर न रहे।
अहसास ए तन्हाई टूटी लय में भी था सुकूँ,
तेरे सीने पे रख के सर भूल जाऊँ जुनूँ।
अंधेरे थे मीठे शिद्धत से, मिगर अब क्या कहें,
फना शहर ए गम ये रात उ’म्र भर न रहे।
वो ख्वाबों का जहाँ, बेखुदी यु हँसना वो दर्द,
ये तक़रीर है दिल की, तेरा रिश्ता था फ़र्ज़।
लम्हों की ये मस्ती है बस आज के लिए,
गुरूर ए चाहत की ये बात उ’म्र भर न रहे।
रिफकत नाज हैं खामोशियों में बस मेरे आँसू,
वो मंज़र भी ठहरे, हैं यादों के जबाल नूर सू ।
शहर ए गम क्यु हमं हर दर्द नया सा कहें,
सोज ए कर्ब अहसास तमाम उ’म्र भर न रहे।
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जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर
मननं कुरु, चिन्तनं कुरु, कर्मभावं धारय the importance of reflection, contemplation, and maintaining the spirit of action (karma). - लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें ।