जब कोई जगह छूट जाती है,
तो ऐसा लगता है मानो
मन का एक हिस्सा भी वहाँ से टूट गया हो।
उस जगह से न जुड़ाव रह पाता है,
न वह अपनापन।
सब कुछ जैसे एक दूरी में बदल जाता है
एक खिंचाव जो धीरे-धीरे उभरता है।
वह अपनापन,
जो पहले वहाँ महसूस होता था,
अब कहीं खो-सा जाता है।
अगलीे बार जब हम उस जगह लौटते हैं,
तो ऐसा लगता है
जैसे हम वहाँ पहले कभी थे ही नहीं।
एक अजनबी भावना घेर लेती है।
संवेदनाओं को व्यक्त करना
तब और भी कठिन हो जाता है।
शब्द जैसे बिखरने लगते हैं,
मानो मन की गहराई तक पहुँचना
उनके लिए मुमकिन ही नहीं।
न वे भावों को पकड़ पाते हैं,
न सही से व्यक्त कर पाते हैं।