यहाँ एक कविता है जो आपकी परछाइयों की यादों को समर्पित है:
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.. मेरी परछाइयाँ याद आएँगी
जब भी तुम उस पुराने रास्ते से गुज़रोगे,
जहाँ हम दोनों ने साथ में कदम रखे थे,
वहाँ की धूल में मेरी परछाइयाँ मिलेंगी,
जो तुम्हें हमारी यादों की कहानियाँ सुनाएँगी।
वो शामें जब सूरज ढलता था,
और हम दोनों ने मिलकर सपने बुने थे,
उन लम्हों की परछाइयाँ अब भी वहाँ हैं,
जो तुम्हारे दिल को छू जाएँगी।
जब भी तुम उस बगीचे में जाओगे,
जहाँ हमने हँसी-खुशी के पल बिताए थे,
वहाँ की हरियाली में मेरी परछाइयाँ होंगी,
जो तुम्हें हमारी मुस्कान की याद दिलाएँगी।
वो रातें जब चाँदनी में हम बैठे थे,
और तारों की छाँव में बातें की थीं,
उन रातों की परछाइयाँ अब भी चमकती हैं,
जो तुम्हारे सपनों में आकर चमकेंगी।
जब भी तुम उस नदी के किनारे जाओगे,
जहाँ हमने अपने दिल की बातें की थीं,
वहाँ की लहरों में मेरी परछाइयाँ होंगी,
जो तुम्हें हमारी मोहब्बत की याद दिलाएँगी।
वो पल जब बारिश की बूंदों में भीगे थे,
और एक-दूसरे की आँखों में खो गए थे,
उन पलों की परछाइयाँ अब भी भीगी हैं,
जो तुम्हारे दिल को गीला कर जाएँगी।
जब भी तुम उस पहाड़ी पर चढ़ोगे,
जहाँ हमने अपने सपनों को उड़ान दी थी,
वहाँ की हवाओं में मेरी परछाइयाँ होंगी,
जो तुम्हें हमारी उम्मीदों की याद दिलाएँगी।
वो दिन जब हमने साथ में हँसी-खुशी बाँटी थी,
और एक-दूसरे के साथ जीने की कसमें खाई थीं,
उन दिनों की परछाइयाँ अब भी जीवित हैं,
जो तुम्हारे दिल को सजीव कर जाएँगी।
जब भी तुम उस पुराने घर में जाओगे,
जहाँ हमने अपने प्यार की नींव रखी थी,
वहाँ की दीवारों में मेरी परछाइयाँ होंगी,
जो तुम्हें हमारी वफाओं की याद दिलाएँगी।
वो समय जब हमने साथ में सपने देखे थे,
और एक-दूसरे के साथ जीने की कसमें खाई थीं,
उस समय की परछाइयाँ अब भी जीवित हैं,
जो तुम्हारे दिल को सजीव कर जाएँगी।
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