कृपा कर दो हे
ब्रह्मज्ञान विद्वान पुरूष।
चलो मैं हारी एक पल को विजई
हो तेरा पौरुष।
छोड़ न,
मरोड़ मेरी कलाई।
बनाई न जाने कितनी रोटियां
और भूख कितनों की मिटाई।
मान जा, मनन कर।
कुछ तो ,यतन कर।
मत पकड़ कमर मेरी।
अमर हो जायेगा क्या तू
कृपा कर।
दया कर छोड़े दे।
उसके खातिर जाने दे।
मान ले।
क्या मिलेगा जिस्म मेरा देख कर।
अरे।
सोच न ज़रा
है तेरा ये ही सर्व प्रथम घर।
आ
नहीं न
हे सर्वेश्वर रक्षा त्राहि माम।
कोई तो सुनो।
मेरी रक्षा करो ,ऊपर बुलालो या कोई अन्य मार्ग चुनो।
अरे वहशी दरिद्र
काम वासना के गिद्ध।
अर्ध नग्न कर दिया।
छोड़ वक्षस्थल मेरा।
इसने बनाया कल तेरा। बढ़ाया बल तेरा।
क्या है नही कोई तेरी माता बहन।
कैसे करती है वो तुझको सहन।
अब रहम कर, मत मार न
न कर सकूंगी मैं चीख पुकार न।
एक विनती है मेरी।
हो दया दृष्टी गर तेरी।
छोड़ दे यू उघार ही।
मैं न कहूंगी कहीं भी।
इतना सब किया
फिर भी सब संभाल लूंगी।
दान दे दे प्राण का , मैं भी दुआएं दूंगी।
तूने आंख फोड़ी, खाल नोची।
रक्त चूसा ,और मारा लात घूसा
फिर न आई जाति मेरी ,धर्म मेरा।
दैहिक वासना के मद में न ही पूछा न ही सोची।
अब भी मुझे उम्मीद है,विश्वास है।
छोड़ देगा प्राण तू भी।
होगा किसी का लाल तू भी।
मैं भी किसी की लाडली हूं।
बस नसीहत में पली हूं।
रात पढ़कर कमर कसकर थी बनी मैं डॉक्टरनी।
ए खुदा मेरे प्रभू, क्या यही एक बाकी थी करनी।
न रहा विश्वास तुझपे , न ही इस संसार पे।
एक आशा ले मैं अबला
राह में परिवार के।
सुन, जाने दे
अगर तूने जाने दिया
मेरे प्राणों पर उपकार किया।
तो मैं तुझे फिर से मिलूंगी।
और तुझे कुछ न कहूंगी।
जाने दो। , सोचो
मैं अकेली, घर की चेरी।
नमक रोटी में भी खेली।
आज तक मैं कुछ न बोली।
जो हुआ सब छुपा लूंगी।
आह करुणा वेदना सब झेल
लूंगी बन के गूंगी।
अरे आह, न घसीट ,न पीट मत मार।
मत तोड़ मेरी बाह को ।
सुन ले मेरी भी आह को।
प्राण जाने को हुए अब।
छोड़ अब तो,
आंख से ओझल हुए सब।
रिक्त मेरी प्रार्थना थी रिक्त ही यह वेदना है।
जा चला जा मनचले , तुझे और भी तो नोचना है।
मैं तो हारी प्राण प्यारी ,
मैं चली थी पार पाने
फिर हुई मेरी रात कारी।